कुम्भ मेला:  हर 12 वर्ष के अंतराल में क्यों होता है कुंभ मेला?

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हिंदु धर्म का सबसे बड़ा धार्मिक मेला – कुम्भ हर 6 वर्ष में अर्धकुम्भ और हर 12 वर्ष में महाकुम्भ पर्व का आयोजन होता है। इस वर्ष हरिद्वार का महाकुम्भ 11 साल में ही आयोजित हो रहा है। इससे पहले सन 1938 में यह कुंभ ग्यारह वर्ष बाद हुआ था। इस वर्ष आयोजित होने वाले हरिद्वार में कुंभ मेले की तैयारियां अपनी पूरी तेजी में हैं। 83 वर्ष बाद 12 वर्ष के बजाय इस बार 11 वर्ष के अंतराल में कुंभ मेले का आयोजन होने जा रहा है। कहते हैं कि ग्रहों के राजा बृहस्पति कुंभ राशि में हर बारह वर्ष बाद प्रवेश करते हैं। प्रवेश की गति में हर बारह वर्ष में अंतर आता है, और यह अंतर अधिक होते होते सात कुंभ बीत जाने पर एक वर्ष कम हो जाता है, इस कारण आठवां कुंभ ग्यारहवें वर्ष में पड़ता है।

कुंभ मेला दुनिया भर में किसी भी धार्मिक प्रयोजन हेतु भक्तों का सबसे बड़ा आयोजन होता है। कुंभ का पर्व 12 वर्ष के समयान्तराल में चारों में से किसी एक पवित्र नदी के तट पर मनाया जाता है, जो हैं उत्तराखंड स्थित हरिद्वार में गंगा नदी, मध्य प्रदेश स्थित उज्जैन में शिप्रा नदी, नासिक (महाराष्ट्र) में गोदावरी नदी और प्रयागराज (उत्तर प्रदेश) में त्रिवेणी संगम जहां गंगा, यमुना और सरस्वती नदियों का परस्पर संगम होता है।

हिंदू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जब बृहस्पति कुंभ राशि में, और सूर्य मेष राशि में प्रवेश करता है, तो कुंभ मेले का आयोजन किया जाता रहा है। प्रयागराज (पूर्व नाम इलाहाबाद) का कुंभ मेला सभी मेलों में सर्वाधिक महत्व रखता है। कुंभ का अर्थ होता है- कलश, ज्योतिष शास्त्र में कुंभ राशि का भी यही चिह्न है। कुंभ मेले की पौराणिक मान्यता अमृत प्राप्ति के लिए हुए समुद्र मंथन से जुड़ी हुई है।
देवताओं एवं राक्षसों ने जब समुद्र मंथन किया और फलस्वरूप उसके द्वारा प्रकट होने वाले सभी रत्नों को आपस में बांटने का निर्णय किया। समुद्र के मंथन द्वारा जो सबसे मूल्यवान रत्न निकला वह था अमृत, उसे पाने के लिए देवताओं और राक्षसों के बीच बहुत संघर्ष हुआ।

देवताओं और दैत्यों का युद्ध सुधा कुंभ को लेकर 12 दिन तक 12 स्थानों में चला और उन 12 स्थलों में सुधा कुंभ से अमृत छलका जिनमें से चार स्थल मृत्युलोक में है, शेष आठ इस मृत्युलोक में न होकर अन्य होकर अन्य लोकों में (स्वर्ग आदि में) माने जाते हैं। 12 वर्ष की अवधि देवताओं का बारह दिन के बराबर होती है। इसीलिए प्रत्येक 12वें वर्ष ही सामान्यतया इन स्थानों में कुंभ पर्व की पंचाग स्थिति बनती है।

अमृत को असुरों से बचाने के लिए भगवान विष्णु ने वह पात्र अपने वाहन गरुड़ को दे दिया। असुरों ने जब गरुड़ से वह पात्र छीनने का प्रयास किया तो उस पात्र में से अमृत की कुछ बूंदें छलक कर पृथ्वी के कुछ स्थानों में गिर गयी। और जिन स्थानों में वे गिरी, उन स्थानों में ही कुम्भ पर्व का आयोजन किया जाता है, ये स्थान ही प्रयागराज, नासिक, हरिद्वार और उज्जैन में हैं। तभी से प्रत्येक 12 वर्षों के अंतराल पर इन स्थानों पर कुंभ मेला आयोजित किया जाता है।

प्रयागराज कुम्भ पर बना रोचक विडियो देखें –

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