व्यक्ति का निर्माण या रोबोट का निर्माण?

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आज, आप लोगों को मेरे विषय का ये शीर्षक शायद  कुछ अटपटा सा लग रहा होगा, परन्तु  ये कड़वा लेकिन सत्य है। अतीत से वर्तमान का निर्माण हुआ है और वर्तमान से ही भविष्य का निर्माण होना है। ये सब कुछ जानते हुए भी हम क्या अपने कर्तव्यों का पालन भली भाँति कर पा रहे हैं? इस पर अवश्य ही विचार किया जाना चाहिए। आप लोग सोच रहे होंगे कि आज मैं ये सब क्यों कह रहा हूँ? काफी विचार करने के बाद व बहुत सारे घटनाक्रमों का अनुभव करने के बाद ही मैंने इस विषय का चयन करा।

क्या आप बता सकते हैं कि महाभारत का युद्ध  क्यों हुआ?

महाभारत का युद्ध होने का मूल ही परिवार में  छिपा भाव था,और परिवार के बड़े सदस्यों पर किया गया विश्वास था दुर्योधन सहित कौरवों  ने  परिवार के बड़े पर विश्वास किया और युधिष्ठिर सहित पाण्डवों ने भी परिवार के बड़े सदस्यों पर विश्वास किया । परन्तु परिवार के बड़े सदस्यों ने निज हित के कारण अपना दायित्व ईमानदारी से नही निभाया और जिसका लाभ शकुनि ने उठाया।

हर देश के बच्चे उस देश की धरोहर होतें हैं और उन धरोहरों को एक विशेष  आकार देने का दायित्व होता है परिवार का, समाज का और विद्यालय का। परिवार में सर्वप्रथम माँ का क्योंकि वो बच्चे की प्रथम गुरु  मानी जाती है। फिर पिता का क्योंकि वो बच्चे के आदर्श होते हैं, बाकी तो हर सदस्य बच्चों के मानसिक व शारीरिक विकास में  अपना महत्वपूर्ण योगदान देता ही देता है। माँ बच्चों को कोमल हृदय बनाती है, उनके मन में  दया,करूणा, ममता, त्याग व समर्पण के भाव जगाती है। वही पिता बच्चों को वाह्य वातावरण का सामना करने की शिक्षा देता है। परिवार में  इनके अलावा दादा व दादी बच्चों के मन-मस्तिष्क में धार्मिक भावना का विकास करते हैं व परिवार के अन्य सदस्य उसका सामाजिक विकास करते हैं। अतः यह एक परिवार की बल्कि एक परिवार की ही नहीं मैं तो कहता हूँ हर परिवार को यह नैतिक दायित्व बखूबी निभाना चाहिए ।

अब हम बात करते हैं समाज की तो समाज में रहकर ही बच्चों को परिवार से मिले ज्ञान को प्रयोगात्मक रूप से सीखने का अवसर मिलता है क्योंकि समाज एक प्रयोगशाला है। इसलिए समाज भी बच्चों के मानसिक व शारीरिक विकास में अपना महत्वपूर्ण योगदान देता ही देता है। परिवार की ही तरह समाज को भी अपना दायित्व  बखूबी निभाना चाहिए।

विद्यालय,जो कि शिक्षा का केन्द्र है। जहाँ बच्चा घर से दूर अलग परिवेश में अलग-अलग परिवारों से व परिवेश से आये हुए बच्चों के साथ सामूहिक रूप से शिक्षा ग्रहण करता है। जहाँ  पर बच्चा समूह में रहना सीखता है। समूह के साथ रहकर सहयोग व समन्वय की भावना के साथ रहना सीखता है। विद्यालय भी बच्चों को पारिवारिक वातावरण देता है व विद्यालय का हर सदस्य कोमल हृदय कच्ची मिट्टी को एक आकार प्रदान करता है व बच्चों का मानसिक व सामाजिक विकास के साथ उनका शारीरिक विकास भी करता है। इसलिए परिवार समाज और विद्यालय के सामूहिक प्रयास से एक शिशु भविष्य का जिम्मेदार नागरिक बनता है और राष्ट्र के विकास में अपना महत्वपूर्ण योगदान प्रदान करता है।

ये सब तभी संभव है जब किसी देश के ये तीन अंग अपना कार्य पूर्ण निष्ठा, लगन व ईमानदारी से करें। परन्तु मुझे दुर्भाग्य से ये कहना पड़ रहा है कि  अपने व्यक्तिगत हितों की पूर्ति में परिवार, समाज व विद्यालय इतने स्वार्थी हो चुके हैं कि इनके द्वारा अपने – अपने दायित्वों का निर्वाह भी मात्र दिखावटी प्रतीत होता है।

आज परिवार में नैतिक आदर्शों का अभाव है संयुक्त परिवार अब एकल परिवार में परिवर्तित होतें जा रहें हैं। बड़ों के प्रति सम्मान की भावना घटती जा रही है। संस्कृति व संस्कारों के प्रति लोगों का दृष्टिकोण बदलते जा रहा है। भारतियता का स्थान पाश्चात्यीकरण ने ग्रहण कर लिया। रिश्ते सिमटते चले गये हैं। परिवार के सदस्यों में ममत्व की जगह औपचारिकता आ गयी। पहले परिवार में मतभेद भी थे, नोकझोंक भी थी, परन्तु इतना सब कुछ होते हुए भी छोटे से घर में सब प्रेमभाव के साथ मिलकर  रहते थे।साँझा चूल्हा होता था। सब अपने दायित्वों का निर्वहन पूरी ईमानदारी से करते थें। दादा-दादी की देख रेख में बच्चों को संस्कृति व संस्कारों से परिचित कराया जाता था और बच्चों में परिवार व समाज के प्रति विशेष लगाव होता था। तब पूरा मौहल्ला भी परिवार ही होता था। इस तरह एक बालक और बालिका परिवार के हर रिश्तों से परिचित होते थे।

परन्तु हमने निज हित की पूर्ति  के  लिए परिवार से ही दूरी बना लिया और परिवार की परिभाषा को भी बदल कर सीमित कर दिया। इस तरह हमनें  बच्चों को व्यक्ति से रोबोट  बना दिया, उनकी भावनाओं का दोहन करके। एक माँ अपने बच्चों को सीखा रही है कि आधुनिक बनों पर वह आधुनिकता की सही परिभाषा बच्चों को नही बता रही है, एक पिता अपने बच्चों से कह रहा कि विकास करों मगर दुर्भाग्यवश वह विकास का अर्थ  ज्यादा से ज्यादा धन कमाना बता रहा है , चाहे सही रास्ते से या गलत रास्ते से। बड़ों का अपमान करना,झूठ बोलना, दूसरों को मूर्ख बनाना आदि आधुनिकता और बुद्धिमत्ता की पहचान मानी जाती है । नशा करना, मद्यपान करना, महंगे शौक पालना ही आजकल व्यक्तित्व की सही पहचान मानी जाती है, भावुकता, ममता,परिवार के सदस्यों से प्रेम की भावना आजकल संकीर्ण मानसिकता मानी जाती है। जिसकी शिक्षा हर माता-पिता अपने बच्चों को दे रहें हैं और उनकी हर गलती पर उनको डाँटने के स्थान पर उनको प्रशय दे रहे हैं। जो कि कदापि उचित नही है।

अब हम बात करते हैं समाज की तो आपको बताते चलूँ कि समाज, परिवार की बड़ी ईकाई है। जो कुछ परिवार में घटित होता है वही सब कुछ समाज में घटित होता है। बच्चा जो परिवार में सीखता है उसको समाज में लागू करता है। परन्तु क्या समाज अपना दायित्व ईमानदारी से निभाता है? मुझे दुःख के साथ कहना पड़ रहा है नही। समाज का प्रतिनिधित्व करता है।

सिनेमा व मीडिया और दुर्भाग्यवश दोनों ही प्रतिस्पर्धा की दौड़ में इस तरह दौड़ चले जा रहे हैं कि उचित और अनुचित का भेद करना ही भूल चुके हैं। पहले सिनेमा की बात करें, सिनेमा ने भारतीयों की भावनाओं का उपहास करने में कोई कसर नही छोड़ी। माँ-बाप को खलनायक बनाया,परिवार के दूसरे सदस्यों को शत्रु बना दिया। छोटों को समझदार व बड़ों को मूर्ख सिद्ध करने में कोई कसर नही छोड़ी। बड़ों का अपमान करना सिनेमा ने ही सिखाया, घर व परिवार का विरोध करने की शिक्षा सिनेमा ने ही दी। नशे को प्रोत्साहन सिनेमा ने ही दिया। बलात्कार व अवैध संबंधो का ज्ञान सिनेमा ने दिया, ब्राह्मण, क्षत्रिय व वैश्य को समाज के लिये घातक बताने वाला सिनेमा ही है। हिन्दु धर्म  को बुरा बता व  दूसरे धर्मों को अच्छा बताने वाला सिनेमा ही है। हिन्दी भाषा का उपहास सिनेमा ही बनाता है, विद्यालय व महाविद्यालयों को मनोरंजन स्थल व शिक्षक वर्ग को मनोरंजन का साधन मात्र बताने वाला सिनेमा ही है, समाज मेंं अपराध व अपराधियों को प्रोत्साहन देने व बढ़ावा देने का काम सिनेमा ने ही किया,पाश्चात्यीकरण को प्रोत्साहन सिनेमा ने दिया।

जिस सिनेमा को समाज ने सिर-आँखों बैठाया, उसी सिनेमा ने ही समाज को धोखा दिया, ऐसा होना भी स्वाभाविक था क्योंकि जो समाज के लिए आदर्श थे वो खुद ही नशे के आरोपों में घिरते चले जा रहें हैं और अपना चारित्रिक पतन करते चले जा रहे हैं। जिनका खुद ही कोई चरित्र ना हो, उसको समाज का नेतृत्व करने के भी कोई अधिकार नहीं है। बच्चों को बेहतर भविष्य देने के लिये और बेहतर चरित्र देने के लिये ये जरूरी है कि चलचित्र को व टीवी पर आने वाले कुछ कार्यक्रमों पर नियन्त्रण लगा देना चाहिए ।

अब हम बात करते हैं मीडिया की तो एक समय होता था जब प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता पाने के लिए बच्चों को समाचार सुनने व पढ़ने के लिए प्रेरित करतें थें। परन्तु  अब मीडिया ने अपना स्तर इतना गिरा दिया है कि अब बच्चों को इसके माध्यम से अब ज्ञान तो नही मिलता परन्तु अश्लीलता जरूर प्राप्त होती है।प्रिंट मीडिया से  अब साहित्य गायब हो चुका है। साहित्य का स्तर अब काफी गिर चुका है। साहित्य में भी अश्लीलता का आगमन हो चुका है। अब बच्चें समाज से सीखे भी तो क्या सीखें?

अब बात करतें हैं विद्यालयों की। विद्यालय का नेतृत्व ही अयोग्य हाथों में है। इसलिए इनसे किसी प्रकार की कोई अपेक्षा करनी ही मूर्खता है। विद्या और  विद्यालय दोंनो ही आजकल धन कमाने  के साधन बन चूकें हैं। शिक्षक एवम् संचालक दोनो ही बच्चों को धन कमाने का साधन मात्र मानते हैं। शिक्षक अपने कोचिंग में  बच्चों की भीड़ को बढ़ाने के लिए विद्यालय में अध्ययन कार्य करतें हैं। संचालक अपने स्कूल की आय बढ़ाने को ज्यादा से ज्यादा बच्चों की ना केवल भीड़ एकत्रित करतें हैं  बल्कि बच्चों के साथ गलत समझौता भी करते हैं। उनकी राय में  बच्चे भगवान होते हैं ।कारण तो आप समझ ही गए होंगे। शिक्षक की छवि कुछ तो सिनेमा ने बिगाड़ी। रही सही कसर विद्यालय संचालक वर्ग ने पूरी करदी। कभी-कभी तो मुझे लगता है कि शिक्षकों से ज्यादा महत्व तो स्कूल संचालकों के लिए बस चालक व परिचालक रखते हैं। पहले से शिक्षक का स्थान विद्यार्थी से उच्च होता था।आज विद्यालयों में छात्र-छात्राओ के लिए तो आसन के रूप में कुर्सी व मेज होती है और शिक्षक की कुर्सी तो कक्षा से हटा दी जाती हैं।जब शिक्षक का ये सम्मान संचालक  करते हैं,तो फिर विद्यार्थी शिक्षक का क्या सम्मान करते हैं?

अब जब ये हाल परिवार, समाज व विद्यालय का है तो आप नौनिहालों से क्या अपेक्षा करेंगे। पहले से बच्चा घर से बाहर परदेश जाता था तो उसे या तो गुरु के संरक्षण  मे या फिर किसी परिचित के संरक्षण में  ना केवल रखा जाता था बल्कि उन पर पूर्ण विश्वास किया जाता था और गुरु हो या फिर परिचित वो भी उनके विश्वास पर खरे उतरते थें।परन्तु आज समय बिल्कुल विपरीत है। आज हम बच्चों को विकास की परिभाषा भी ऐसी बता रहें हैं, जिससे आज बच्चा व्यक्ति बन पायेगा या नही इसका तो पता नही परन्तु वो रोबोट अवश्य बन रहा है।

समाप्त

 

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हिमाँशु पाठक मूल रूप से पिथौरागढ़ जिले के गंगोलीहाट के पठक्यूड़ा गाँव से है। पाँच भाई-बहनों में सबसे छोटे व सबके प्यारे ।आपका जन्म अल्मोड़ा में 14 जुलाई को एक प्रतिष्ठित ब्राहमण परिवार में हुआ पिता जी का नाम श्री हेम चन्द्र पाठक एवं माताजी का नाम श्रीमती गोबिन्दी पाठक था । आपकी प्रारम्भिक शिक्षा अल्मोड़ा में हुई, व उच्च शिक्षा हल्द्वानी में हुई। वर्तमान में आप हल्द्वानी में शिक्षण कार्य में संलग्न हैं। आपकी रूचि बचपन से ही शिक्षण के साथ-साथ लेखन, गायन व रंगमंच में भी रही । आपकी प्रमुख रचनाओं में से कु छ निम्न प्रकार रही हैं। प्रकाशित पद्य रचनाऐं :- ढलता हुआ सूरज, वो गरीब की बेटी, एक ही स्थल पर, युग आयेगें, दो छोर,गांधारी ,चाय की चुस्की ,जिन्दगी, सप्त-शर्त ,चिट्ठी, बाबूजी, पथिक,वेदना,बैचैनी,चाय पर चर्चा,कोई रोता है, एक पुरोधा का अंत ,काश,कृष्ण से द्वारिकाधीश तक,प्रतीक्षा, अप्रकाशित पद्य रचनाऐं- , , तेरी अदा, दीवारें,,,' आज अगर आजाद भगत सिंह भारत में जिन्दा होते', मौन हूँ मैं, परिवर्तन, दूरी, आदि। प्रकाशित गद्य रचनाऐं : - कुसुम दी, अपने दोहन पर व्यथा-मैं प्रकृति हूँ ,आँखें,जड़ो से दूर,आँगन,सूर्योदय उत्तराखंड का,ढलता हुआ सूरज, इस रात की सुबह,पाती प्रेम की,एक पुरोधा का अंत व एक मोड़ पर,तेरहवीं(धारावाहिक) , एक था बचपन,वो कौन थी,उस मोड़ पर(धारावाहिक),और व्यक्ति का निर्माण या रोबोट का अप्रकाशित गद्य रचनायें :- गंगा के तट पर, छोटी-छोटी बातें,मैं नहीं हम,आत्म परिचय,सफर जिन्दगी का आदि नाट्य रचना : - एक और विभाजन, दोहन प्रकृति का, आत्मदाह, शहीद की हसरत आदि

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