पहाड़ी वाद्य यंत्र – मधुर सुर और संगीत का मेल

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pahadi vadhya yantra

लोक संस्कृति से धनी उत्तराखंड में लोकगीत यहां की संस्कृति का अहम हिस्सा है। पर्व-मेलो संस्कारों में गाए जाने वाले अलग अलग लोक गीतों को खास बनाने में यहां के स्थानीय वाद्य यंत्र अहम भूमिका निभाते हैं। हालांकि वाद्य यंत्रों में इलाकाई फर्क तो नहीं दिखता, लेकिन गायन शैली में बडा अन्तर है।

चिमटा, बीनबाज (मसकबीन) ,खड़ताल, हुडका, दमू, तूर, मंजीर, ढोल, नांगर, रणसिंह, ढोलक कांस-तायी, लोटी (पुराने कांसे की), डिंगार, कसेड़ि।

रंगोड़ दारूण पट्टी में न्योली जरा हट के गाई जाती है। हुड़के से निकलने वाले 22 तालों की गूंज इस इलाके की पहाड़ियों से टकराकर लोक संगीत का साक्षात दर्शन कराती है।

ढोल से निकलने वाले 52 ताल को सुनकर इस संगीतमयी जादू को महसूस करना हो, तो क्षेत्र में कोई प्रचलित मेला उपयुक्त जगह है या गांव में लगने वाली बैसी। बरयात (विवाह ) में बजने वाले ताल अलग ही होते हैं। छलेती बाज, ढोल, नांगर, दमू, रणसिंह और बीनबाजे के साथ छलयोर सफेद चूड़ीदार पजामा लंबा घेरदार कुर्ता पहने हाथ में तलवार और पीतल या ताम्बे की बनी थाल लेकर कदम से क़दम ताल के साथ मिलाकर नाचते है। तरह तरह के करतब भी इस बीच दिखाते है, छल्योर।
लम्बा पैदल रास्ता तय करना है, बरयात अभी चपड़ बैंड के पास पहुंची है, अभी और आगे जाना है, वर – नारायण और रंगीले सजे हुए बारातियों के बीच बजता हिटो बाज चहल पहल भरे माहौल को और खुशनुमा बना देता है। माहौल कुछ रंगीला हो जाता है। की बस कदम थके न रिदम रुके ना, बस चलते रहे। नाचते कूदते ज्यों बरयात ब्योली (दुल्हन) के पटागण (आंगन ) में पहुँचती है तो बाजगी बजाते है मोल बाज (आंगन) रास्ते में चलते हुए बजाए जाने वाले ताल को बरेती बाज कहते है। बारात जहां से उठती है। वहां से लेकर लड़की के घर पहुंचने तक यह लगातार बजता रहता है। ढोल, हुड़का बनाने के लकड़ी का उपयोग होता है, तो तांबे से नगारा बनता है। वाद्य यंत्रो के लिए स्थानीय पेड़ो से लकड़िया मिलती है।

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