बारिश की वो रात…

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वर्ष 1996
12th का एग्जाम देकर कोई काम धंधा ढूंढ रहा था, तभी अखबार में वैकेंसी दिखी – डोर टू डोर मार्केटिंग के लिए। मैं इंटरव्यू देने के लिए पहुंचा, और मेरी सेलेक्शन भी हो गई। काम था कुछ हाउसहोल्ड आइटम्स जैसे कि Hot Case … किचन नाइफ … इत्यादि आदि की sale का। Company Warehouse से ले कर, डोर टू डोर जाकर बेचना, और शाम को अपना कमीशन काटकर पैसे और बचे हुए मैटेरियल्स को कंपनी के Warehouse में जमा कर देना। उनकी ट्रेनिंग अच्छी थी। मैं सौ दो सौ रोज कमाने लगा था।

एक दिन टीम लीडर ने कहा – हम लोग पतरातू चलते हैं। वह मार्केट बहुत अच्छी है। हम 5 लोग बस पकड़कर और कुछ सामान लेकर पतरातू पहुंचे, लॉज का एक कमरा लिया। पतरातू पहुंचते-पहुंचते दोपहर हो गई थी। शाम को आसपास मोहल्ले में, हमने अपना कुछ सामान बेचने की कोशिश की। मेरे टीम लीडर का कहना था यहां से 4 किलोमीटर के आसपास बासल (Birla Aluminum) की कॉलोनी है। वहां पर कुछ सामान बिक सकता है।

दूसरा दिन, मैं और एक साथी, अपने सामान लेकर बताए हुए पगडंडी से बासल के लिए निकल पड़े। रेलवे पटरी के किनारे किनारे एक पगडंडी से चलते चलते 3 घंटे हो गए, तो हमें हाईवे पर पहुंचे। हाईवे पर पहुंचने पर, एक व्यक्ति से बासल कॉलोनी के बारे में पूछा। उनका कहना था कि यहां से 3 किलोमीटर और है। जून का महीना था और भीषण गर्मी पड़ रही थी। थैला लेकर लगभग 3 घंटे से चलते चलते हमारी हालत भी पस्त हो चुकी थी।

खैर 3 किलोमीटर और चलकर के बासल गेट पहुंचे। गेट से कॉलोनी लगभग 1 किलोमीटर और अंदर थी। भरी दोपहर में हम कॉलोनी पहुंचे। 1- 2 दरवाजे खटखटाने पर पता चला कि अभी यहां सभी लोग सो रहे हैं, … 4:00 बजे के बाद आना। हम भी पारले जी का बिस्कुट खा कर और हैंडपंप का पानी पीकर पेड़ के नीचे पड़ गये।

शाम 4:00 बजे से फिर डोर टू डोर Knock करना शुरू किया, खैर दिन अच्छा था। शाम 6:00 बजे तक सारा सामान बिक चुका था, और लगभग हम दोनो ₹300 कमा चुके थे।

अब हमने वापस लौटने की सोची। थोड़ा बहुत नाश्ता करके हम बासल गेट पर पहुंचे। लगभग 7:00 बज चुके थे, अंधेरा घना हो चुका था। गेट पर गार्डस ने पुछा – “कहां जाना है?” … हमारी यह बताने पर कि – “पतरातू जाना है”, उसका कहना था “अभी आपको कोई गाड़ी नहीं मिलेगी, और रोड का डिस्टेंस करीब 25 किलोमीटर है।” हमने जब पगडंडी होकर जाने के लिए कहा, तो उसका कहना था – वह दूरी भी लगभग 18 किलोमीटर है और नक्सलाइट एरिया है, आप जा नहीं पायेगें। उनसे पूछा कि “रात में रुकने का कोई अरेंजमेंट?” उनका कहना था बासल गेस्ट हाउस में चले जाइए। खैर वापस 1 किलोमीटर चलकर बासल गेस्ट हाउस पहुंचे। गेस्ट हाउस में caretaker कहना था कि यह सिर्फ बासल के गेस्ट के लिए हैं आपलोग नहीं रुक सकते हैं। उनसे “अन्य कहीं रुकने के व्यवस्था हो जाएगी!” पूछने पर उनका कहना था मंदिर के बाजू में एक पुजारी जी रहते हैं, शायद वह आपको रुकने का इंतजाम कर दें।

आधा किलोमीटर चलकर मंदिर पुजारी जी को अपनी समस्या बताई। पुजारी जी ने अपना कमरा दिखाया, खपरे का कमरा छह बाई आठ का कच्चा फर्श और छह फीट उंची छत। उसी में पंडित जी की गृहस्थी और उनकी एक बछिया भी रहती थी। गर्मी का दिन था। पंडित जी ने कहा आप मंदिर के बरामदे में सो जाइए, कोई दिक्कत नहीं है।
मंदिर के गर्भ गृह के चारों तरफ 5 फीट की एक बरामदा थी, जो तीन तरफ से खुली थी। सिर्फ ऊपर छत थी। दिन में लगभग 30 किलोमीटर चलने से हम काफी थक चुके थे। मंदिर के बरामदे में पड़ गये। मंदिर के सामने ही हैंडपंप था। उसका पानी ने आस-पास कीचड बना दिया था, जिससे अत्याधिक मच्छर थे। बुरी तरह थके होने के बावजूद मच्छरों ने हमें सोने नहीं दिया। हम किसी तरह गप्पे मारते हुए, मच्छर भगाते समय गुजार रहे थे।

रात में 12:00 बजे के करीब भीषण बारिश शुरू हो गई। बारिश भी आड़ी तिरछी, हम बरामदे में भीगने लगे। हम खड़े हो गए। फिर भी हमारे घुटने के नीचे पैंट और जूते भीग रहे थे। अन्य कोई उपाय भी नहीं था। लगभग 3 घंटे बारिश के बाद पूरा फर्श गीला हो चुका था। घुटने से नीचे पैंट और जूते भीग चुके थे। मच्छरों का प्रकोप जारी था। किसी तरह खड़े-खड़े जागते हुए सुबह हुई। पूरा शरीर तप रहा था। नींद भूख प्यास और थकान से बेहाल थे। हैंड पंप मे मुंह हाथ धोकर, पानी पीकर वापस निकल पड़े। लगभग 1 किलोमीटर चलने के बाद हम हाईवे पहुंचे, और बस पकड़ कर पतरातु।

तो यह थी, उस खुशनुमा दिन और उस बरसाती रात की कहानी। आपके जीवन में भी ऐसे ही कुछ न कुछ अनुभव रहें होंगे। वास्तव में ऐसे ही दिनों से मिलकर जीवन बनता है। फिर मिलते हैं और कहीं…


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