कुमाऊं में महिला रिसर्चर के रूप में कार्य करते हुए अनुभव

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female acceptance in society

कोई दो साल पहले एक रिसर्च के सिलसिले में कुमाऊं के कुछ इलाकों में घूम रही थी, लोगों से मिल रही थी, इंटरव्यूज़ कर रही थी। इस दौरान लगातार एक बात हुई, कि जिन पुरुषों से सवाल पूछती वो जवाब मुझे देने के बजाय मेरे ड्राइवर को देते थे। जानकारी मैं मांगती, बताया ड्राइवर भैया को जाता। वो संकोच से भर जाते, कभी मुंह फेर लेते ताकि बताने वाला मेरी तरफ़ देख ले, कभी कह ही देते कि आप मैम को बताइये।

मैं समझ रही थी सब, कि अपनी तरफ़ के पुरुष (एक्चुअली ज़्यादातर जगह के) एक महिला को बॉस के रूप में इमेजिन मुश्किल से कर पाते हैं, कर भी लें तो स्वीकार नहीं कर पाते।

तो क्या करना चाहिए था मुझे इस परिस्थिति में? मैं या तो इस बात को अपने ईगो पर लेकर उन्हें वहीं सुना सकती थी (10 साल पहले यही करती), या इस बात का अफ़सोस मना कर ख़ुद को विक्टिम मान कर दुखी होती रहती… पर मैंने दोनों में से कुछ नहीं किया बस उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया. मुझे उन लोगों से नाराज़गी नहीं है, गुस्सा नहीं है। कभी मिलेंगे तो घर बुला कर चाय भी पिलाउंगी। क्यूंकि मुझे पता है कि मुझे कुछ प्रूव नहीं करना है।

पहले लगता था कि दुनिया मर्दों की है, इसमें सर्वाइव करने के लिए ख़ुद को प्रूव करना ज़रूरी है, दोगुनी मेहनत करती रही ताकि पुरुष सहकर्मियों के बराबर सम्मान पा सकूं, अपने ख़्वाब हाशिये पर रखती रही, ताकि दूसरों के सपने पूरे करने में मदद कर सकूं… पर अब ये नहीं करती।

अपनी ज़िन्दगी अपने हिसाब से जी कर ना मैं किसी पर अत्याचार कर रही हूं, ना किसी पर अहसान! मेरे सपने पूरे करना, ये किसी और की ज़िम्मेदारी नहीं है, मुझे खुश रखना किसी और की ड्यूटी नहीं है। मैं कोशिश करती हूं कि किसी की भावनाओं को ठेस ना पंहुचाऊं, लेकिन कोई मेरी भावनाओं का खयाल रखे, इतना एक्सपेक्टेशन भी किसी से नहीं है। किसी की बात पर कैसे रियेक्ट करना है, कितना हर्ट होना है, कितना सीरियसली लेना है ये तो मेरे हाथ में है. सेंसिटिव रही हूं हमेशा, इमोशनल हूं, पहले किसी की बात से भी हर्ट हो जाती थी। पिछले कुछ सालों में इस पर काम किया। अब मुझे हर्ट कर सकने वाले लोगों की लिस्ट इतनी छोटी है कि कई-कई दिन (हफ्ते भी) बिना हर्ट हुए गुज़र जाते हैं 😉

इस बात का लालच नहीं है कि कोई अपनी ज़िन्दगी में शामिल ही करे, ना इस बात की हवस है की कोई मेरी ज़िन्दगी में आये ही आये। मेरा अपना सफर है, आपका अपना। अगर साथ चलने के लिए एफर्ट ना करना पड़े तो साथ चलते हैं… अगर अपनी खुशी से (मेरी खुशी के लिए नहीं) मुझ पर अपनी भावनाएं लुटा सकते हैं तो साथ चलते हैं, अगर बिना संकोच मेरा प्यार स्वीकार कर सकते हैं तो साथ चलते हैं, अगर दोनों एक दूसरे की यूनिकनेस को एक्सेप्ट और रिस्पेक्ट करते हैं तो साथ चलते हैं, अगर मुझ से सब जैसा बन जाना एक्सपेक्ट नहीं करते हैं तो साथ चलते हैं… इसी फलसफे पर चली हूं हमेशा, इसलिए ज़िन्दगी में वही लोग हैं जो मुझे बेहतर इंसान बनाते हैं, या जिन्हें मैं बेहतर इंसान बनाती हूं। आदर्श दुनिया जैसे कांसेप्ट पर मेरा भरोसा नहीं है, लेकिन ये मानती हूं कि चुनाव हमेशा हमारे हाथ में है। इसी चुनाव के कारण ज़िन्दगी में वैसे लोग हैं ही नहीं, जिनके कारण दुनिया कहती हैं कि ‘दुनिया बहुत बुरी है’।

मैं लड़की पैदा हुई थी… मैंने ‘औरत’ होने की तकलीफें सही पर मैंने अपने लिए ‘इंसान’ की आइडेंटिटी चुनी है। अपने आखिरी दिन तक एक अच्छी इंसान बन जाऊं, यही मेरा evolution होगा, यही मेरी कामयाबी होगी।


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1 COMMENT

  1. पहले महिलाओं के लिए परिस्थितियां इतनी अच्छी नहीं थी । देश आज़ाद हुए 74 साल हो गए है पर महिलाएं अपनी आजादी के लिए आज भी प्रयासरत है।

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