दीदी की जुबानी-कुमाऊं की कहानी ।

0
37

दीदी ओ दीदी आओ हों, काट छा हो दी हम लोग पाख में आपण क इंतजार करण लाग रैया”

दीदी हँसते हुए, “अरे बस उणियारै लाग्या रूँ।”

दीदी ने सारे काम छोड़े और चल दी छत में  सारे बच्चों ने दीदी को घेर लिया। पूरा मुहल्ला छत में  आ गया।

“दीदी आगे क्या हुआ”? “क्या शेर मंदिर में  आया “? बच्चे एक साथ उत्सुकतावश बोले।

“अरे नही नही शेर तो जंगल को चले गया होगा”। एक बच्ची बोली।

सभी लोग हँस पड़े।

तभी दीदी बोली ,”अरे! सुनाती हूँ, साँस तो लेने दो”।

एक बच्चा बोला,” दीदी क्या अभी तक साँस नही ले रही थी”।

सभी हँस पड़े। “अरे बुद्धु, तू भी।”

दीदी आगे बोली, “शेर की दहाड़ जब नजदीक आ गयी तो सभी घबरा गये। मगर माता कपर विश्वास कर सभी माता का भजन करती रहीं । तभी एक विशालकाय शेर मंदिर के प्रांगण मे प्रवेश कर गया सभी के अंदर भय व आश्चर्य का मिलजुला प्रभाव था ।

“फिर क्या हुआ दीदी?” एक बच्चा घबराते हुए  बोला

खैर शेर मंदिर के  द्वार के निकट गया माता की सात परिक्रमा करने लगा।  और फिर मंदिर में  माता के सामने शांत भाव से बैठ गया ।

सभी महिलाएं भजन कर रही थी शुरू में  तो उनकी आवाज मेंं भय का मिश्रण  था,परन्तु बाद में शेर को शान्त मुद्रा में बैठे देख उत्साह से भजन गाने लगी।

करीब आधे घंटे तक शेर मंदिर में माता के सामने बैठा।फिर एक परिक्रमा माता के सामने बैठा,तीन बाल पूँछ पटका , एक ऊँची दहाड़ मारी और जंगल की ओर छलाँग मार कर जंगल मे विलुप्त हो गया।  हम सभी ने माता को प्रणाम  किया।

सुबह होते ही हम सभी लोग अपने-अपने घर को चले गयें । पूरे गाँव में इस बात की चर्चा हर जुबां पर था।

कहानी यहाँ  पर समाप्त कर सभी लोगों को संबोधित कर दीदी ने पूछा,” तो बच्चों कैसी लगी कहानी”?

सभी बच्चे बोले ,”बहुत अच्छी  दीदी। अगली कहानी”!

दीदी बोली ,अगले हफ्ते “।

समाप्त

हिमांशु पाठक

Previous articleउत्तराखण्ड समाचार 09 मार्च 2021
Next articleविजया एकादशी – 2021
हिमाँशु पाठक मूल रूप से पिथौरागढ़ जिले के गंगोलीहाट के पठक्यूड़ा गाँव से है। पाँच भाई-बहनों में सबसे छोटे व सबके प्यारे ।आपका जन्म अल्मोड़ा में 14 जुलाई को एक प्रतिष्ठित ब्राहमण परिवार में हुआ पिता जी का नाम श्री हेम चन्द्र पाठक एवं माताजी का नाम श्रीमती गोबिन्दी पाठक था । आपकी प्रारम्भिक शिक्षा अल्मोड़ा में हुई, व उच्च शिक्षा हल्द्वानी में हुई। वर्तमान में आप हल्द्वानी में शिक्षण कार्य में संलग्न हैं। आपकी रूचि बचपन से ही शिक्षण के साथ-साथ लेखन, गायन व रंगमंच में भी रही । आपकी प्रमुख रचनाओं में से कु छ निम्न प्रकार रही हैं। प्रकाशित पद्य रचनाऐं :- ढलता हुआ सूरज, वो गरीब की बेटी, एक ही स्थल पर, युग आयेगें, दो छोर,गांधारी ,चाय की चुस्की ,जिन्दगी, सप्त-शर्त ,चिट्ठी, बाबूजी, पथिक,वेदना,बैचैनी,चाय पर चर्चा,कोई रोता है, एक पुरोधा का अंत ,काश,कृष्ण से द्वारिकाधीश तक,प्रतीक्षा, अप्रकाशित पद्य रचनाऐं- , , तेरी अदा, दीवारें,,,' आज अगर आजाद भगत सिंह भारत में जिन्दा होते', मौन हूँ मैं, परिवर्तन, दूरी, आदि। प्रकाशित गद्य रचनाऐं : - कुसुम दी, अपने दोहन पर व्यथा-मैं प्रकृति हूँ ,आँखें,जड़ो से दूर,आँगन,सूर्योदय उत्तराखंड का,ढलता हुआ सूरज, इस रात की सुबह,पाती प्रेम की,एक पुरोधा का अंत व एक मोड़ पर,तेरहवीं(धारावाहिक) , एक था बचपन,वो कौन थी,उस मोड़ पर(धारावाहिक),और व्यक्ति का निर्माण या रोबोट का अप्रकाशित गद्य रचनायें :- गंगा के तट पर, छोटी-छोटी बातें,मैं नहीं हम,आत्म परिचय,सफर जिन्दगी का आदि नाट्य रचना : - एक और विभाजन, दोहन प्रकृति का, आत्मदाह, शहीद की हसरत आदि

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here