अपड़ु मुलुक अपड़ी भाषा (हिंदी – गढ़वाली कविता)
आजकल गांव से शहरों में भाग रहे हैं लोग,और सब को लगता है कि अब जाग रहे हैं लोग।अपड़ी कूड़ी पूंगड़ी छोड़ के फ्लैट...
पीर ये पहाड़ सी (कविता)
बरस फिर गुज़र गया
तिमिर खड़ा रह गया
उजास की आस थी
निराश क्यों कर गयाशहर शहर पसर गया
साँस साँस खा गया
कोविड का साल ये
जहर जहर दे...
आखिर क्यों ??? किसानों पर रचित कविता : निर्मला जोशी
बहुत भारी पड़ेगा तुम्हे
किसानों के दिल से खेलना
आये दिन उनके नाम पर
सियासत करनाये न भूलना कभी भी
कि तुम्हारी थाली में
जो रोटी है
वो मेरे अन्नदाता...
क्या खोया क्या पाया (कविता, स्मिता पाल)
क्या खोया क्या पाया,
हिसाब ये किसने है लगाया?
जो भी मिल गया इस सफर में,
उसे हम ने पूरे दिल से अपनाया।किसी के कड़वे बोल ने,
दिल...




