पहले प्यार से लेकर आखिरी प्यार के भी बाद की कहानी

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[dropcap]ये[/dropcap] किस्सा है – सच्चा थोड़ा सा, अच्छा थोड़ा सा, जिंदगी के कई किस्सो की कहानी है।

पहला प्यार उसे तब हो गया था जब वो तीसरी में पढता था। स्कूल में बस उसकी एक झलक देख लेने से ही उसका मन पढाई में लगता, पर जिस दिन वो स्कूल नहीं आती या वो उसे नहीं दिखती तो उसका दिल फिर किसी बात पर नहीं लगता। एक बार जब उसने (he) उस (she) से पेंसिल मागी और उसने देने से मना कर दिया, खैर इस इंकार को उसने उसका बचपना समझ के माफ़ कर दिया। साथ ही ऐसा भी कहा जाता है कि, हर घटना का दिन तय होता है, तो दिल तो टूटना ही था, पहली बार… वो भी उसी दिन तो वो टूटा, जब उसने (he) अपना टिफ़िन उसे (she) किसी और के साथ शेयर करते देखा।

दूसरी बार उसे तब प्यार हुआ जब वो छठी में गया। इस बार वो जताने में पीछे नहीं रहा। किस्मत से हालात ने एक मौका दिया। 1 बार तिमाही इम्तेहान में वो उसकी सीट, उसके ठीक पीछे ही लगी, और सिचुएशन अब ये थी कि वो किन्हीं कारणो से उस एग्जाम की पूरी तैयारी करके नहीं आई थी, तो वो घबरा गयी पेपर में आये सवालों को देखकर। ऐसे में पहली बार उसने उस से मदद मागी। अब तो इसके पाँव जमीन में नहीं थे। खैर अपना लिख न लिख कर उसने (he) उसको (she) सभी सवालों के जवाब बताये। अपनी सगी क्रश के मदद मागें जाने से।

वो बहुत खुश था और काफी दिनों तक था। समय बीता… अब दूसरी बार उसका दिल तब टुटा जब इसी तिमाही टेस्ट का रिजल्ट आया, और उसी विषय में (जिसमे लड़के ने लड़की को सवालों के जवाब लिखाये थे) लड़की के नंबर उस से ज्यादा क्या बल्कि पूरी क्लास में सबसे ज्यादा आये थे। इस बार भी उसे ताज्जुब की साथ खुद पर दया और रोना भी आया, और लड़की के घर वालों का अच्छा परिचय टीचर से था ये पता भी चला और लड़की के चक्कर को दिल से झटके से बाहर निकाल दिया।

तीसरी बार उसे प्यार तब हुआ, जब वो साइकिल में कॉलेज जा रहा था, और फ़िल्मी तरीके से अभी अभी गुजरे रिक्शा से एक दुप्पट्टा उड़ता हुआ आया और साइकिल के हैंडल में अटक गया। खैर रिक्शा से उतर कर उसने अपना दुपट्टा वापस लिया और खिलखिलाती हुई वापस रिक्शा में बैठ कर अपनी माँ के साथ चली गयी। शाम को घर वापसी में उसने देखा वैसा सबके नसीब में नहीं होता, उसने देखा कि वो उसी के मोहल्ले की पास वाले मोहल्ले में आई है।

अब कॉलेज आते जाते उसके दीदार हो जाता था हर दिन ही। हफ़्तों गुजर गए आँखों के टकराने से लेकर अब बात एक दुसरे को देख मुस्कुराने तक बढ़ गयी थी। वक़्त रूमानी गुजर रहा था। किसी तरह मोबाइल नंबर एक्सचेंज हुए। बाते भी होने लगी। लड़के ने पार्ट टाइम एक प्रिंटिंग प्रेस जहाँ शादी विवाह के कार्ड्स छपते हैं वहां काम करना शुरू कर दिया। अब उसकी कमाई का एक हिस्सा लड़की के मोबाइल रिचार्ज, महीने में 1-2  दफा समोसे- चाऊमीन पर पर खर्च होने लगा।

वक़्त को मानो पंख लगे थे। तेजी से बीतता जा रहा था। और इनका relation भी प्यार-इकरार- तकरार-मनुहार जैसे पढ़ाव से गुजर रहा था। फिर एक दिन उसने उसे बताया की घर वालों ने उसका रिश्ता कहीं और तय कर दिया है, और लड़का सरकारी नौकर है (ये उस दौर की बात है जब सरकारी नौकरी का क्रेज और रुतबा हुआ करता था, और उसकी हैसियत इतनी थी नहीं कि वो लड़की के घर वालों से बात कर सके)। पर फिर भी वो भड़क गया। सीधे लड़की के घर वालों से बात करने पहुच गया। मामला गर्म हो गया। लड़की के घर वालों से लड़की से पूछा, तो लड़की थोडा practical थी उसने बोला मेरा ऐसा कुछ नहीं है, जो आपको सही लगे वो करो। ये सुन लड़का चौंक गया कि कल तक साथ जीने मरने की कसम खाने वाली आज ऐसी बात कर रही है।

बहरहाल उफ़्फ़ ये समाज, जहा ये बोला जाता है की मर्द को दर्द नहीं होता। सो वो भी कहाँ अपना अहं झुकाने वाला था। चार बातें सुना कर निकल लिया। पर इस बार फिर से दर्द गहरा था । सो दर्द से हुए घाव को भरने के लिए सिगरेट और शराब का सहारा लाजिमी था,  तो उसके जेब में पैसा था, और सामने बार, बियर बार, अबकी बार मोदी सरकार के जुमले को सुन सुन के वो पक भी गया था, तो उसने भी उसी तर्ज पर अबकी बार, बियर बार आजमाने की सोची।

साथ ही इस बार दिल टूटने पर उसने आती जाती लड़कियों को छेड़ना शुरू कर दिया। अगले दो – चार महीने तक यही चलता रहा… खूब गाली खाता, कई बार पिटने की भी नौबत आ जाती। पर जैसा सभी के साथ होता ही है कभी ना कभी, जमीर उसका भी जागा। ये मैं अपनी जिंदगी से साथ क्या कर रहा हूँ! जब ये लगा तो एक अलग ही परिवर्तन उसकी personality में आया…।
खैर अब उसकी जिंदगी का एक मिशन मिल गया था, जहाँ भी वो प्रेमी- प्रेमिकाओं को देखता, पार्क में, रास्तों में, उनके विरुद्ध एक अनकही जंग छेड़ देता। इन सालों में उसने कई अपने जैसे ढूंढ लिए थे। और महिला सुरक्षा के नाम पर वो पार्क में बैठने वाले प्रेमी प्रेमिकाओं पर ज़ोर चला के उनको जलील कर वो और उसका ग्रुप वहाँ से जलील कर भगा देता था या उनके घरवालों के बता के दोनों की शादी करवाने के लिए घरवालों को इत्तिला करवा देता था। पर इस ज़ोर जबर्दस्ती से जल्द ही उसका खुद भी दिल भर आया एक दिन, और फिर से उसने कुछ अलग करने की सोची।
अचानक एक दिन वो शहर से गायब हो गया, कुछ लोग परेशान हुए तो कुछ ने चैन की साँसे ली। अब कहानी का घटनाक्रम 3-4 वर्ष बाद आगे बढ़ता है।
कुछ वर्षो बाद कुछ professional courses कंप्लीट कर के, एक बड़े शहर के शांत और पॉश  इलाके में मैरेज कौंसलर का ऑफिस डाल दिया। अब ये भाईसाहब शादीशुदा लोगो (जिनकी शादी को 2 – 4 वर्ष हो चूकें हों) को – साथ साथ खुश कैसे रहें, रिश्ता कैसे बनाए रखें आदि जैसे मसलों की सलाह देते हैं और कौन सा रिश्ता चल सकता है किसको तोड़ने में ही भलाई है इसकी सलाह बड़ी ही ईमानदारी और ज़िम्मेदारी से देते हैं। युही नहीं इलाके में काफी मान सम्मान हैं उनका, और ये काम उनका बहुत अच्छा चल रहा है।
कह नहीं सकते और जान भी नहीं सकते कि, आज का कोयला ना जाने कब कल हीरा हो जाये!
PS : घर पर कम ही जाते हैं, कुछ लोग कहते हैं, उनकी खुद ही अपनी पत्नी से नहीं बनती, कुछ कहतें घर में कोई है ही नहीं जाएँ किसके लिए! कयास है लगाने वाले तो कुछ भी लगाएंगे ही।

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