Nanakmatta Gurudwara (नानकमत्ता गुरुद्वारा)

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नानकमत्ता गुरुद्वारा उत्तराखंड के उधम सिंह नगर जिले में खटीमा और सितारगंज के बीच खटीमा से 16 km और सितारगंज से 12 किमी0 की दूरी पर स्थित है। जो कि सिखों का पवित्र व ऐतिहासिक गुरुद्वारा है।

यहाँ हर साल हजारों की संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं। यह गुरुद्वारा उत्तराखण्ड में स्थित सिखों के तीन प्रमुख तीर्थ स्थानों में से एक है।  इस गुरुद्वारे के अलावा हेमकुंड साहिब गुरुद्वारा और श्री रीठा साहिब गुरुद्वारा भी सिखों के पवित्र तीर्थ स्थानों में हैं।

इस गुरुद्वारे से कुछ ही दूरी में एक बांथ है जिसका नाम नानक सागर है। गुरुद्वारा नानकमत्ता साहिब के नाम से ही इस जगह का नाम नानकमत्ता पड़ा। वैसे तो यहाँ सभी धर्म के लोग आपसी प्रेम भाव के साथ रहते है पर यहां  सिख धर्म के लोगों की संख्या औरों से ज्यादा है।

कहा जाता है कि सिक्खो के प्रवर्तक और प्रथम गुरु गुरु नानक देव जी यहाँ सन 1514/ 1508  ईस्वी में आए थे।

इस गुरुद्वारा का रखरखाव, कृषि, पशुपालन, donations आदि सारा कार्य गुरुद्वारा प्रबन्धक कमेटी द्वारा जिलाधिकारी उधम सिंह नगर के अंतर्गत किया जाता है।

विश्व भर से भक्त मन मे विश्वास और आस लिए आते हैं गुरुनानक जी का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। नव विवाहित जोड़े भी यहाँ नव जीवन शुरू करने से पहले कृपा प्राप्ति की आस में यहाँ आते हैं। गुरुद्वारा में आपको गुरुवाणी की मधुर आवाज आपको स्थिर कर देती है।

गुरुद्वारा नानकमत्ता साहिब का इतिहास

नानकमत्ता का पुराना नाम सिद्धमत्ता है। सिखों के प्रथम गुरू नानकदेव जी अपनी कैलाश यात्रा के दौरान यहाँ रुके थे और बाद में सिखों के छठे गुरू हरगोविन्द साहिब भी यहाँ आये। गुरू नानकदेव जी सन 1508 में अपनी तीसरी कैलाश यात्रा, जिसे तीसरी उदासी भी कहा जाता है, के समय रीठा साहिब से चलकर भाई मरदाना जी के साथ यहाँ रुके थे।

उन दिनों यहाँ जंगल हुआ करते थे और गुरू गोरक्षनाथ के शिष्यों का निवास था पहले गोरखनाथ के अनुयाइयों के रहने के स्थान के कारण इसे ‘गोरखमत्ता’ या ‘सिद्धमत्ता’ के नाम से जाना जाता था। गुरु शिष्य और गुरुकुल के चलन के कारण योगियों ने यहाँ गढ़ स्थापित किया हुआ था जिसका नाम गोरखमत्ता था। कहा जाता है कि यहाँ एक पीपल का सूखा वृक्ष था। जब नानक देव यहाँ रुके तो उन्होने इसी पीपल के पेड़ के नीचे अपना आसन जमा लिया।  कहते हैं कि गुरू जी के पवित्र चरण पड़ते ही यह पीपल का वृक्ष हरा-भरा हो गया।  यह सब देख कर रात के समय योगियों ने अपनी योग शक्ति के द्वारा आंधी तूफान और बरसात शुरू कर दी।  तेज तूफान और आँधी की वजह से पीपल का वृक्ष हवा में ऊपर को उठने लगा, यह देकर गुरू नानकदेव जी ने इस पीपल के वृक्ष पर अपना पंजा लगा दिया जिसके कारण वृक्ष यहीं पर रुक गया। आज भी इस वृक्ष की जड़ें जमीन से 10-12 फीट ऊपर देखी जा सकती हैं। वर्तमान समय में इसे पंजा साहिब के नाम से जाना जाता है।

कहा जाता है कि गुरूनानक जी के यहाँ से चले जाने के बाद सिद्धों ने इस पीपल के पेड़ में आग लगा दी और पेड़ को अपने कब्जे में लेने का प्रयास किया। उस समय बाबा अलमस्त जी यहाँ के सेवादार थे। उन्हें भी सिद्धों ने मार-पीटकर भगा दिया। सिक्खों के छठे गुरू हरगोविन्द साहिब को जब इस घटना की जानकारी मिली तब वे यहाँ आये और केसर के छींटे मार कर इस पीपल के वृक्ष को पुनः हरा-भरा कर दिया। आज भी इस पीपल के हरेक पत्ते पर केशर के पीले निशान पाये जाते हैं।

1937 से पूर्व तक इस गुरुद्वारे का सञ्चालन महंतों द्वारा किया जाता था।  एक छोटा सा गुरुद्वारा स्थानीय निवासियों द्वारा दानाय हुआ था। गुरुद्वारे के निर्माण के लिए जमीन नवाब मेहदी अली खान द्वारा दान दी गयी थी। 1975 में बड़े पैमाने पर कारसेवा कर इसे भव्य और विशाल बना दिया गया।

गुरुनानक योगियों को भोजन बांटकर खाने की सलाह दिया करते थे। एक दफा योगियों ने गुरुनानक की परीक्षा लेने की ठानी। उन्होंने गुरुनानक को एक तिल का दाना दिया और इसे हर किसी से बांटकर खाने को कहा, गुरुनानक ने मरदाना से तिल के दाने को पीसकर थोड़े से दूध में मिलाकर सभी को बाँट देने को कहा। गुरुनानक की सिद्धियों से वह दूध सभी में बंट गया। इसके बाद सिद्ध योगियों के द्वारा गुरूनानकदेव जी से 36 प्रकार के व्यंजनों को खाने की माँग की गई। उस समय गुरू जी एक वट-वृक्ष के नीचे बैठ थे। गुरू जी ने मरदाना से कहा कि भाई इन सिद्धों को भोजन कराओ। जरा इस वट-वृक्ष पर चढ़कर इसे हिला तो दो। मरदाना ने जैसे ही पेड़ हिलाया तो उस पर से 36 प्रकार के व्यञ्नों की बारिश हुई।

कहा जाता है कि योगियों के द्वारा कई भैंसे पाली हुई थीं।  मरदाना ने दूध पीने की इच्छा व्यक्त की तो गुरुनानक ने उन्हें योगियों से दूध मांगने को कहा।  योगियों ने मरदाना को दूध देने से साफ़ मन कर दिया, क्योंकि वह निचली जाति के थे। योगियों ने मरदाना को अपने गुरु से दूध मांगकर पी लेने का ताना भी मारा।  गुरुनानक ने अपनी दिव्य शक्तियों से योगियों की भैंसों का सारा दूध निकलकर पास के कुंए में भर दिया।  मरदाना ने इस कुंए से दूध पिया। अब योगियों को गुरुनानक के देवदूत होने का अहसास हुआ। तभी से इस कुंए को दूध वाला कुंआ कहा जाता है। आज भी यहाँ मौजूद इस कुंए के पानी से कच्चे दूध की महक आती है।

एक बार जब भौंरा साहब में बैठा हुआ बच्चा जब मर गया तो सिद्धों ने गुरू जी से उसे जीवित करने की प्रार्थना की, गुरू जी ने कृपा करके उसे जीवित कर दिया। इससे सिद्ध बहुत प्रसन्न हो गये और गंगा को यहाँ लाने की प्रार्थना करने लगे। गुरू जी ने मरदाना को एक फावड़ा देकर कहा कि तुम इस फावड़े से जमीन पर निशान बनाकर सीधे यहाँ चले आना और पीछे मुड़कर मत देखना। गंगा तुम्हारे पीछे-पीछे आ जायेगी।  मरदाना ने ऐसा ही किया लेकिन कुछ दूर आकर पीछे मुड़कर देख लिया कि गंगा मेरे पीछे आ भी रही है या नहीं इससे गंगा वहीं रुक गई।

आज इस गुरूद्वारे में 200 से ज्यादा कमरों की सराय और बड़े हाल में सभी धर्म, जातियों के श्रद्धालुओं के ठहरने की व्यवस्था है। यहाँ के विशाल लंगर हाल में हजारों लोगों को प्रतिदिन मुफ्त भोजन कराया जाता है।  इस लंगर की व्यवस्था श्रद्धालुओं के सहयोग और कारसेवा से ही संपन्न होती है। नानकमत्ता सिख धर्म की जनसेवा का प्रतीक भी है।

गुरुद्वारे के अंदर एक सरोवर है, जिसमें अनेक श्रद्धालु स्नान करते है और फिर गुरुद्वारे में मत्था टेकने जाते हैं। कहते हैं गुरुनानक देव का आशीर्वाद सब श्रद्धालुओं को मिलता है और कोई भी यहां से खाली नहीं लौटता।

नानकमत्ता का दीपावली मेला

नानकमत्ता सिक्खों के पवित्र तीर्थ स्थल गुरुद्वारे, बाउली साहिब, दूध का कुँआ और 24 घंटे चलने वाले लंगर के लिए जाना जाता है। इन विशेषताओं के अलावा नानकमत्ता यहाँ हर साल लगने वाला दीपावली का मेला भी यहाँ की विशेषता है। वैसे तो नानकमत्ता में हर महीने की अमावस्या को मेला लगता ही है लेकिन दीवाली में लगने वाले 7-8 दिवसीय मेले की भव्यता देखने लायक होती है। यह मेला पिछले कई दशकों से चला आ रहा है। न सिर्फ नानकमत्ता व ग्रामीण क्षेत्र के लोग मेले में ख़रीदारी के लिए आते हैं बल्कि उत्तर प्रदेश के कई जिलों के लोग अपने बच्चों के सिर के बाल उतरवाने भी इस पुण्य अवसर पर आते हैं। उनकी गुरुद्वारे के प्रति एक अटूट आस्था है व अपनी मन्नतों की पूर्ति हेतु हज़ारों श्रृद्धालु प्रतिवर्ष दीवाली के समय नानकमत्ता में दर्शन करने ज़रूर आते हैं।

नानकमत्ता मेले में दुकानें लगाने न सिर्फ स्थानीय व्यापारी आते हैं बल्कि आगरा, बहेड़ी, बरेली, पीलीभीत व निकटवर्ती क्षेत्रों के व्यापारी भी आते हैं। मेला लगाने के लिए भूमि का आवंटन गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी करती है और साथ ही एक “मेला कमेटी” का गठन भी किया जाता है जिसका कार्य मेले को सकुशल क्रियान्वित करना होता है। सुरक्षा के लिए स्थानीय पुलिस व एनसीसी के छात्रों का सहयोग लिया जाता है साथ ही आग की समस्या से निपटने के लिए फ़ायर ब्रिगेड की एक गाड़ी 24 घंटे तत्पर रहती है।

दीवाली की अमावस्या से यहां विशाल मेले का आयोजन किया जाता है। उस समय गुरुद्वारे व नगर की साज-सज्जा देखने लायक होती है।  नानकमत्ता साहिब गुरुद्वारा में लगने वाला दीपावली का मेला इस क्षेत्र का विशालतम मेला माना जाता है। इन दिनों प्रतिदिन गुरुद्वारे में लंगर की व्यवस्था की जाती है।

नानकमत्ता में मेले का चलन शायद इसी लिए प्रारम्भ हुआ कि धान की फ़सल की कटाई के बाद किसानों को घर की ज़रूरत का सामान ख़रीदने के लिए एक बाज़ार की ज़रूरत थी। ग्रामीण परिवेश में बाज़ार की अनुपलब्धता ने मेले को बढ़ावा दिया और तब से आज तक यह मेला प्रतिवर्ष लोगों की ज़रूरतों की पूर्ति के लिए लगाया जाता रहा है।

मेलों में घूमना और लोगों की ज़रूरतों को समझना आपको समाज से रूबरू कराता है।  मेले में हर किसी की अपनी प्राथमिकताएँ होती है। कोई सैर-सपाटे के लिए आता है तो कोई घर के लिए ज़रूरी सामान की ख़रीदारी के लिए तो कोई मेलों की हमारी समाज में क्या महत्ता है ये जानने के लिए आता है। कुल मिलाकर मेले आज भी ग्रामीण भारत का अभिन्न अंग हैं जिन्हें हमें संजोये रखना चाहिये।

नानकमत्ता साहिब दर्शन करने का समय

नानकमत्ता साहिब के दर्शन के लिये पूरे साल में कभी भी जाया जा सकता है क्योंकि यहाँ का मौसम हमेशा अनुकूल ही रहता है पर यदि दीवाली के अवसर पर यहाँ जाया जाये तो उसका एक अलग ही आकर्षण है क्योंकि उस समय यहाँ हफ्ते भर मेला लगता है और देश भर से हजारों श्रद्धालु दीपावली मेले का आनन्द लेने के लिये यहाँ पहुँचते हैं और दर्शन करते हैं।

नानकमत्ता में कई प्राचीन गुरुद्वारे हैं। जिनमे से कुछ हैं

Main Gurudwara

Gurudwara Bhandara Sahib

Gurudwara Doodh Wala Kuan

Gurudwara Baba Almast Sahib

Gurudwara 6th Patshahi

इनके अलावा नानकमत्ता में कई अन्य ऐतिहासिक महत्व के स्थान हैं,

Bowli Sahib

Historical Pipal Tree

Dhoona Sahib

Bhora Sahib

Nearyby attractions

नैनीताल, भीमताल, कॉर्बेट पार्क, आदि नजदीकी पर्यटक आकर्षण के केंद्र है।

नानकमत्ता गुरुद्वारे के बारे में अधिक जानने के लिए वीडियो देखें।

 

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