मां नंदा सुनंदा लौटी अपने ससुराल, भक्तों ने दी माता को अश्रुपूर्ण विदाई

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मां नंदा-सुनंदा लौटी अपने ससुराल, भक्तों ने दी माता को अश्रुपूर्ण विदाई।

नैनीताल। कुमाऊं में कुलदेवी के रूप में पूजी जाने वाली मां नंद-सुनंदा अष्टमी के दिन अपने ससुराल से अपने मायके यानी कुमाऊं की धरती पर पधारी थी। 28 अगस्त शुक्रवार यानि दशमी को मां नंदा-सुनंदा फिर से अपने ससुराल को वापस लौट गए।

मां नंदा-सुनंदा को कुमाऊं में कुल देवी के रूप में पूजा जाती है। माना जाता है कि मां नंदा और सुनंदा साल में एक बार अपने मायके यानी कुमाऊं आती हैं। जहां मां नंदा और सुनंदा की प्रतिमा तैयार कर प्राण प्रतिष्ठा के बाद समझा जाता है कि मां नंदा-सुनंदा अपने मायके पहुंच रही हैं।
शुक्रवार को मां नंदा-सुनंदा का नैनी झील में विसर्जन किया गया। विसर्जन की यह परंपरा उस तरह।जैसे लोग अपनी बेटी को ससुराल के लिए विदा करते हैं।
बता दे कि इस बार कोरोना महामारी के चलते मां नंदा सुनंदा महोत्सव सांकेतिक रूप से मनाया गया। पहली बार ऐसा हुवा होगा कि मां का भब्य डोला भृमण नहीं हुआ और न ही लोग माँ के दर्शन कर पाए। कोरोना जैसी वैश्विक महामारी के बाद भी कुमाऊं मां नंदा सुनंदा का पूरे विधिविधान से स्वागत किया और विदाई की गई। हालाकि इस वर्ष भक्तों को मां नंदा सुनंदा के भव्य डोले के दर्शन नहीं हो पाए लेकिन प्रशासन द्वारा भक्तों की आस्था और श्रद्धा को ध्यान में रखते हुए मां नंदा सुनंदा महोत्सव होने वाले सभी कार्यक्रमों को लाइव प्रसारण के जरिए भक्तों तक पहुंचाने की व्यवस्था की गई थी जिसके चलते भक्त घर पर ही माता के दर्शन कर पाए।
नंदा देवी महोत्सव कुमाऊं के अल्मोड़ा, रानीखेत, भवाली, बागेश्वर, नैनीताल आदि क्षेत्रों में धूमधाम से मनाया जाता है। इस महोत्सव की शुरुआत भाद्रपद माह की पंचमी तिथि से होती है। नैनीताल में इस दिन दोपहर के समय से महोत्सव का शुभारंभ किया जाता है।
समीवर्ती चयनित गांव से लाया है कदली वृक्ष
भाद्रपद माह की पंचमी तिथि को शाम को कदली वृक्ष यानी कि केले का पेड़ लेने महोत्सव की आयोजक संस्था श्री राम सेवक सभा के पदाधिकारी और भक्तजन चयनित गांव में जाते है। अगले दिन भक्तजन कदली वृक्ष को लेकर आते है और वैष्णो देवी मंदिर में इनकी पूजा अर्चना कर नगर में माता के जयकारों के भ्रमण कराया जाता है। जिसके बाद भक्तों द्वारा कदली वृक्ष को नयना देवी मंदिर प्रांगण में लाकर पूजा अर्चना कर इनसे मा नंदा सुनंदा की प्रतिमाओं का निर्माण शुरू होता है।
सप्तमी के दिन आकर्षक प्रतिमाओं का निर्माण कर मंडप में सजा दिया जाता है जिसके बाद अष्टमी के दिन ब्रम्ह मुहूर्त में पंडितों द्वारा पूरे विधि विधान से प्राण प्रतिष्ठा की जाती है जिसके बाद मंदिर प्रांगण के द्वार भक्तों के लिए माता के दर्शन के लिए खोल दिए जाते हैं। दशमी के दिन मां नंदा सुनंदा की प्रतिमाओं को डोले में सजा कर नगर में भव्य शोभा यात्रा निकाली जाती है जिसमें सभी भक्त माता के डोले के साथ और माता के जयकारों के साथ पूरे नगर का भ्रमण करते हैं। अंत में ठंडी सड़क में स्थित पाषाण देवी मंदिर के समीप विधि विधान के साथ मां नंदा सुनंदा की प्रतिमाओं को विसर्जित कर दिया जाता है। हर वर्ष मा नंदा सुनंदा महोत्सव में लाखों की तादात  में भक्तों का सैलाब माता के दर्शनों के उमड़ जाता है लेकिन इस वर्ष मंदिर प्रांगण और नगर सुना पड़ा रहा।
मा नंदा सुनंदा से जुड़ी पौराणिक कथा
कथानुसार मान्यता है कि चंद्र राजा की दो बहनें नंदा व सुनंदा एक बार देवी के मंदिर जा रही थी। तभी एक राक्षस ने भैंस का रूप धारण कर उनका पीछा करना शुरू कर दिया। इससे डरी-सहमी ये दोनों बहनें केले के पत्तों के बीच जाकर छुप गई। तभी एक बकरे ने आकर केले के पत्तों को खा लिया और भैंसे ने दोनों बहनों को मार डाला।

बाद में अतृप्त आत्माओं के रूप में दोनों बहनों ने चंद् राजा को मां नंदा देवी मंदिर स्थापित कर पूजा अर्चना करने को कहा। ताकि उनकी आत्मा को शांति मिल सके। तभी से मां नंदा-सुनंदा की पूजा-अर्चना होने लगी। धीरे-धीरे पूरी देवभूमि (कुमाऊं) में कई जगहों पर भव्य महोत्सवों का आयोजन होने लगा।

चन्द्र वंश के शासन काल से अल्मोड़ा में मनाया जाता है नंदा महोत्सव

नंदा देवी का महोत्सव चंद वंश के शासन काल से अल्मोड़ा में मनाया जाता रहा है। इसकी शुरुआत राजा बाज बहादुर चंद के शासन काल से हुई थी। राजा बाज बहादुर चंद ( सन् 1638-78 ) ही नन्दा की प्रतिमा को गढ़वाल से उठाकर अल्मोड़ा लाये थे। इस विग्रह को उस कालखंड में अल्मोड़ा कचहरी परिसर स्थित मल्ला महल में स्थापित किया गया था। सन् 1815 में ब्रिटिश हुकुमत के दौरान तत्कालीन कमिश्नर ट्रेल ने नन्दा की प्रतिमा को मल्ला महल से दीप चंदेश्वर मंदिर, अल्मोड़ा में स्थापित करवाया था।

नैतीताल में नन्दादेवी महोत्सव अपनी सम्पन्न लोक विरासत के कारण अलग ही छटा लिये हुए हैं परन्तु अल्मोड़ा नगर के मध्य में स्थित ऐतिहासिक नन्दादेवी मंदिर में प्रतिवर्ष भाद्र माह की अष्टमी को लगने वाले मेले की रौनक ही कुछ अलग ही होती है। अल्मोड़ा में मां नंदा की पूजा-अर्चना तारा शक्ति के रूप में तांत्रिक विधि से करने की परंपरा है। पहले से ही विशेष तांत्रिक पूजा चंद शासक व उनके परिवार के सदस्य करते आए हैं। वर्तमान में चंद वंशज नैनीताल के पूर्व सांसद केसी सिंह बाबा राजा के रूप में सपरिवार पूजा में बैठते हैं।

इतिहास के अनुसार नन्दा गढ़वाल के राजाओं के साथ-साथ कुमाऊं के कत्यूरी राजवंश की भी शांति देवी थी। देवीदेवी होने के कारण नन्दादेवी को राजराजेश्वरी कहकर भी सम्बोधित किया जाता है। नन्दादेवी को पार्वती की बहन के रूप में देखा जाता है लेकिन कहीं-कहीं नन्दादेवी को ही पार्वती का रूप माना गया है। नन्दा के कई नामों में प्रमुख हैं शिवा, सुनन्दा, शुभानन्दा, नन्दिनी।


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