माँ गंगा ने बुलाया है – हरिद्वार यात्रा अनुभव

0
9
Haridwar Ganga River

मैैं यहाँ स्वयं  नही आया, बल्कि माँ गंंगा  ने मुझे बुुलाया था अपने सानिध्य में, अपने शुभ-आशीष  और स्नेह के साथ। माँ  पुत्र को बुलाए और पुत्र ना जाए, ऐसा भला होता है क्या?

वर्ष 2018 की बात है मुझे किसी विशेष कार्यवश हरिद्वार जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। मैंने अपनी पत्नी से कहा मुझे हरिद्वार जाना है एक विशेष कार्य से, तो क्यों ना तुम भी चलो? पत्नी ने मेरे प्रस्ताव को स्वीकार किया और इस तरह हमारे हरिद्वार जाने का कार्यक्रम तैयार हो गया।

नियत तिथि को हम लोग सुबह-सुबह हरिद्वार की बस पकड़ने के लिये घर से निकल पड़े। हमारे साथ में  एक बैग, एक अटैची थी तथा एक  छोटा-सा पिट्ठू था जिसमें रास्ते के लिए आलू-पुरी व पानी की दो बोतलें रखी हुई थी। खैर हम लोग नियत समय पर बस-स्टेशन पहुंचे गये। रिक्शे से उतरे ही थे कि सामने हरिद्वार की बस दिखाई दी। हम लोग बस में सबसे आगे की सीट पर बैठ गए ।गाड़ी में ही टिकट लेकर हम लोग आराम से सीट में  बैठ गए।

स्टेशन में  खासी भीड़ थी यात्री अलग-अलग स्थानों केलिए बस की प्रतीक्षा कर रहे थे कुछ लोग बस में  चढ़ रहे थे कुछ परिचित को छोड़ने आये थें। सामान बेचने वाले  बस के भीतर व बाहर अलग-अलग सामान बेच रहे थे।

अब बस भी चलने को तैयार  थी बस में  चालक-परिचालक दोनों ही आ गये थे। चालक ने बस स्टार्ट करदी थी। धीरे-धीरे बस चलनी शुरू हो गयी। बस स्टेशन से बाहर निकल कर शहर से गुजरते हुऐ आगे बढ़ रही थी। करीब एक घंटे तक शहर से गुजरने के बाद बस हल्द्वानी की सीमा से बाहर निकल गयी। हल्द्वानी से हरिद्वार पहुँचने में  तकरीबन  छः से सात घंटे लग ही जाते हैं। तीन घंटे की लगातार यात्रा के बाद बस एक जगह ढाबे में खाने के लिए रुकी वहाँ यात्री बस से उतर कर कुछ भोजन करने लगे, कुछ चाय-पानी लेने लगे। हमनें भी चाय वाले को चाय लाने का कहकर पूरी और आलू निकाल लिए व भोजन करने लगे, साथ में  हमने दही भी मँग लिया था भोजन करने के बाद चाय पी और बस में बैठ गए। थोड़ी देर बाद बस आगे की यात्रा के लिए चल पड़ी।

हरिद्वार की सीमा पर प्रवेश करते ही हमारा स्वागत ठंडी हवा के झोंको  ने करा। उस समय ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो साक्षात माँ प्रकृति व माँ गंगा एक साथ मेरी प्रतीक्षा में पलकें बिछाये हुऐ थे व शीतल व मंद बयार के साथ मेरा स्वागत कर रहे थें। मैं भी उतावला था अपनी माँ से मिलनें के लिये। मन आनन्द की लहरों में गोते लगा रहा था।हरिद्वार की सीमा से स्टेशन तक मैं,  माँ गंगा व माँ प्रकृति से अनगिनत वार्ता कर चुका था।

हम बस से उतर कर हम रिक्शे में बैठकर सबसे पहले धर्मशाला गये क्योंकि धर्मशाला हरिद्वार शहर से हटकर था सो हमें धर्मशाला पहुँचने में हमारा बहुत समय बरबाद हो गया था। उस पर सफर की भी थकान और उस पर कल प्रातः जल्दी उठकर अपने गंतव्य तक भी पहुचँना था इसलिये हमनें  रात में आराम करना ही उचित समझा। खैर धर्मशाला का मालिक भी सज्जन था उसने हमारे लिये  रात्रि में भोजन की व्यवस्था वही कर दी थी। खैर खा-पीकर हम कमरे में विश्राम करने चले गए।

सुबह जल्दी-जल्दी उठकर दैनिक कार्यों से निवृत होकर हमने धर्मशाला के मालिक से चाय के लिये कहा पहले तो वो थोड़ासा ना-नुकुर करने लगा, खैर फिर जैसे तैसे मान गया थोड़ी देर में ही कमरे में चाय आ गई। हमनें चाय पी जो बहुत ही अच्छी बनीं थी। हम लोग आठ बजे धर्मशाला से निकल कर अपने गंतव्य को निकल गये ।दिन में हम लोग अपने काम से निपट वापस धर्मशाला पैदल पैदल ही चल पड़े। दिन का समय था बहुत जोरों की भुख लग रही थी इसलिये रास्ते में एक ढाबे मेंं हमने छोले-चावल खायें और फिर अपने कमरे में आ गये। कमरे में थोड़ा सा आराम करने के बाद, क्योंकि हमारे  पास समय था इसलिए हमलोग हरि की पैड़ी  यानी हरि की पौड़ी  में  आ गये। रास्ते में श्रीमती जी ने भिखारियों को दान देना शुरू कर दिया कुछ सिक्के गंगाजी को अर्पित किये अंततः हम पहुँच गये हरिकीपौड़ी।

उस दिन तो हम हरकीपौडी में ज्यादा नही रूके। असल में इसके पीछे भी कारण था। मैं  चाहता था कि हरि की पौड़ी में, मैं ज्यादा समय बिताकर इसको समझना चाहता था, और ये मेरे लिए तभी संभव था। जब मैं हरि की पौड़ी निकट किसी धर्मशाला में आकर रहूँ। तो मैं और मेरी पत्नी दोनों ही अल्मोड़ा धर्मशाला की तलाश में  हरि की पौड़ी निकल पड़े  थोड़ा सा चलने के बाद एक गली में हमें धर्मशाला के दर्शन हुऐ, धर्मशाला में  जाकर संचालक महोदय को पहले अपने कुमाऊँनी होने का प्रमाण दिया। उन्होने  अपना परिवार खाता निकाला फिर मेरे बुढ़दादा का नाम पूछा, परदादा जानकारी ली बाबूजी व चाचाजी आदि-आदि की जानकारी जुटाने के बाद वो आश्वस्त हो चूकें थे कि हम कुमाऊँनी हैं तो उन्होनें हमें धर्मशाला में रहने के लिए कमरा दे दिया।

दूसरे दिन जल्दी सुबह हम,  पहले वाले धर्मशाला से निकल कर हरि की पौड़ी निकट वाले धर्मशाला में आ गये। हमने वहाँ कमरे में सामान रखा और हम निकल गये मनसादेवी मंदिर को जो पहाड़ की ऊंचाई पर स्थित है। हम लोग सीढ़ियाँ चढ़ते हुऐ करीब दो से तीन घंटे में मंदिर पहुँच गये। माँ के दर्शन करने में समय लग गया, क्योंकि उस दिन मंदिर में ॠद्धालुओं की भीड़ थी।

दिन में करीब दो-तीन बजे हरिद्वार बाजार पहुँचे । बहुत जोरों की भुख लग रही थी इसलिये  बाजार में पत्नी ने बताया कि हरिद्वार में पंडितजी  की कचौड़ियाँ  प्रसिद्ध हैं तो हम पहुंचे पंडितजी की दुकान हालांकि पत्नी ने ये कहकर डरा रखा था कि पंडितजी की कचौड़ियाँ कहीं खत्म ना हो गयी हों। खैर किस्मत  अच्छी थी। वरना ये सच है कि पंडितजी केवल दो ही घंटे बैठते हैं और उन दो घंटों के अंदर उनकी कचौड़ियाँ खत्म हो जाती हैं। खैर उस दिन माँ की कृपा थी सर पर कचौड़ियाँ मिल गयी खाने को। हमने पहले जी भर के अपनी क्षुधा शान्त करी फिर बाहर आकर लस्सी पी और वापस कमरे में  आ गये।

काफी थक चुके थे। इसलिये कमरे में जाकर पहले तो कमर सीधी करने लगे। कमर सीधी करते-करते जाने कब नींद आ गई पता ही नही चला करीब तीन घंटे बाद नींद खुली। हमलोग बाहर आ गये चायपीने के लिए। शाम के छः बज चुके थे। धर्मशाला के संचालक अब हमारे अच्छे परिचित बन चुके थें इसलिए उनका मार्गदर्शन से हमारा कार्यक्रम सहज हो पा रहा था। उनका ही हमें मार्गदर्शन था कि हम सात बजे तक गंगा आरती में शामिल हों। वैसे ये मेरी भी दिली-तमन्ना भी थी। हमलोगों ने निश्चय किया कि हमें अब सीधे हरि की पौड़ी  ही जाना चाहिए। पाँच मिनट में ही हम हरि की पौड़ी  पहुँच चुके थे।

हरि की पौड़ी, हरि की पैड़ी, हालांकि आज इसको हर की पौड़ी भी कहा जाता है जो प्रचलित है वास्तव में इसको हरि की पौड़ी कहते हैं क्योंकि  कहते हैं कि जब हरिद्वार में  पहुँच कर जब माँ गंगा इस स्थान में  मार्ग  भटक गईं थी, तो तब श्री हरि ने माँ गंगा का मार्गदर्शन इसी स्थान में किया था और उन्हें  आगे का मार्ग दिखाया था। तब माँ गंगा ने इसी स्थान पर हरि के चरणों का स्पर्श किया था ।इसलिये इसका नाम हरि की पौड़ी पड़ा।

हमने हरि की पौड़ी में ही चाय पी। और यही हुआ मुझे ज्ञान यथार्थ का। मेरे बाबूजी मेरे से कहते थे कि माँ गंगा सबों की तारणहार है। मुक्तिदायनी है ये प्राणी मात्र की। उस दिन ही मुझे उनकी उस बात का मर्म समझ में आ पाया। मैने वहाँ जीवन का वो सत्य देखा जो आज तक की उम्र तक ना ही मैं  देख पाया था, ना ही समझ पाया था।

मैने वहां देखे। संसार से  वैराग्य ले चुके वो लोग जिन्हें उनके अपने या तो त्याग  चुके थें, या फिर वो अपनों को त्याग चुके थे। मैंने उनकी आँखों  में किसी भी प्रकार का कोई भाव  नही देखा अपनों के प्रति। वे  केवल एकटक देखते थे प्रकृति को या फिर आँख बन्द कर ध्यानमग्न हो जाते ईश्वर में। यूँ कहें तो वो अंतरचक्षु से भी ईश्वर को दैख थे, व वाह्य चक्षु से  भी ईश्वर को देख रहे थे। ना मैंने उनकी आँखों में अतीत की स्मृतियाँ देखी और ना ही देखी भविष्य की चिन्ता।

इससे तो ये साफ था कि माँ गंगे अपने सभी बच्चों की चिन्ता करती व उनके भोजन की व्यवस्था भी। फिर थोड़ासा आगे बड़े तो कई सन्यासियों के साक्षात्कार हुऐ अपनी-अपनी धुन में रमे हुए। संसार में  रहते हुए भी संसार से दूर। अच्छा! याद आनें  लगे मुझे टीवी पर आने वाले बड़े-बड़े  सन्यासी या गुरूजी। मैं तुलना करने लगा इन वैरागियों से , टीवी पर आने वाले तथाकथित सन्यासियों से इनका पहनावा जो हर छल से रहित था, टीवी पर आने वाले तथाकथित सन्यासियों से जिसमें  आडम्बर के सिवा कुछ भी नही। इनके व्यवहार की तुलना टीवी पर आने वाले तथाकथित सन्यासियों से धरती आसमान का अंतर , टीवी में आने वाले तथाकथित संतों में  ज्ञान का अभाव अहंकार का भाव व इन वास्तविक संतों में अंहकार का अभाव व ज्ञान का भाव। मुझे दया भी आती थी  तथाकथित संतों के अनुयायियों पर, जो उन संतों पर तो धन की वर्षा कर देते हैं पर यहाँ भिखारी को एक रूपया देने को राजी नही।

खैर हम थोड़ा सा आगे बढ़े तो कुछ भिखारियों का झुंड दिखाई दिया जो एक दूसरे  के आश्रयदाता  बने हुऐ थें। जो भोजन के लिये पंक्तिबद्ध हों जा रहे थें भोजन करने के लिए  किसी भंडारे में। जिन्हें संसार ने दुत्कारा माँ गंगा ने उन्हें अपनाया  हरिकीपौड़ी में। वास्तव में सत्य है ईश्वर बड़े ही कृपालु हैं। फिर थोड़ासा आगे जाने पर एक वृद्धा दिखाई दी जो मल व गंदगी से सनी हुई  घिसटते हुऐ माँ गंगा की चरणों का स्पर्श करने जा रही थी। वो वृद्धा अपने अंतिम क्षणों को जी रही थी अपनी मुक्ति की प्रतीक्षा में। फिर हम आगे बढ़ते उस स्थान में पहुँचे जहाँ माँ गंगा की आरती होनी थी एक स्थान पर हमनें अपनी-अपनी चप्पलें उतारी और आगे बढ़ें।

एक स्थान पर हम आरती की सामग्री खरीदने लगे,वहाँ पर हमें दो-तीन युवक मिले जो बहुत ही सज्जन प्रतीत हो रहे थे उन्होंने हमारी गंगा जी में पुष्प विसर्जन में  अति सहायता की अंत में सेवा शुल्क के नाम पर पाँच सौ रूपये माँगने लगे। हमने दो सौ इक्कीस रूपये में उनसे पीछा छुड़ाया। अंत में हम शामिल हुऐ माँ गंगा की आरती में। माँ ने उस आरती में अपनी पूर्ण कृपादृष्टि हम पर बरसाई। हम उस स्थान के निकट थे जहाँ पर आरती हो रही थी सो आरती करने का सौभाग्य भी प्राप्त हुआ और माँ की चरणरज भी प्राप्त हुई साथ ही प्राप्त हुई माँ की अनुकम्पा।

आरती समाप्ति के पश्चात सब लोग बाहर आए  बाहर आने के साथ शुरू हुई चप्पलों की खोज। सभी लोग अपनें-अपनें चप्पल ढूंढ रहे थे जिनके  चप्पल मिल गये वो तो गंगा तर गये , बांकि बचे लोग श्रम में लग गये जिन लोगों की चप्पलें मिल गयी वो दूसरे उन लोंगो का हौसला अफजाई करते जो श्रम में व्यस्त व चिन्ता  से ग्रस्त थें।

हम भी श्रम में व्यस्त व चिन्ता में ग्रस्त वालों की श्रेणी में थे। अगर भूलवश किसी दूसरे की चप्पल कोई पहन लेता तो उसपर चोरी का आरोप वही लगाता जो अपनी चप्पल पहचान लेता और दूसरे के पाँव में देखकर क्रोधित होता। असल में वो भी इस प्रकार के दंश से गुजर चुका होता। खैर वो अपनी चप्पल पहन कर सुकून के साथ दूसरों की हौसला अफजाई कर वहाँ से निकल जाता। अब हमारी बात हम चप्पल विहीन हो नंगे पांव ही धर्मशाला की ओर चलने लगें रास्ते मे जो भी मिलते नंगे पाँव चलने का कारण पूछते कुछ नंगे  पांव चलने को हमारी तपस्या समझ हमारी चरण-वंदना करते, कुछ कहते चलो अच्छा हुआ शनि टला, कुछ लोग हमे दुबारा उस स्थान में जाकर फिर श्रम में रत रहने को कहते और ज्ञान देते श्रम का फल मीठा होता है, आपको ऐसे हार नही माननी चाहिए। एक ने तो एक शेर ही अर्ज कर दिया कि “मैहनत करने वालों की कभी हार नही होती”।

खैर अंतर में गुस्सा तो बहुत था, पर माँ गंगा की शरण में  थे इसलिए मिश्रित भाव लेकर कमरे में  पहुँचे मगर संचालक महोदय की नजरों से बचते-बचाते कमरें में  पहुँचे , क्योंकि चलते समय उन्होंने हमे चेताया था कि हम अपने चप्पलों का ख्याल रखें  वहाँ चप्पल खोने के संभावना भी हो सकती है जो  हम पर तो चरितार्थ हुई थी। और कमरे से जूते पहनकर बाजार आए । पत्नी के लिए चप्पल खरीदी तथा पिछली बातों को बिसरा कर  एक दुकान में हमने मलाई वाला गडबडान दूध पीया। फिर रबड़ी खाई । और फिर कमरें में आकर सो गये और अगले दिन हमनें हल्द्वानी के लिए  बस पकड़ी और हम हल्द्वानी पहुंच गये।

माँ गंगा के साथ बिताया हुआ हर वो पल आज भी मेरे मन-मस्तिष्क के ताजगी से भर देता है।आज भी मुझे ना जाने क्यों ये लगता है कि जैसे माँ गंगा बुलाती है मुझे अपने पास हमेशा-हमेशा के लिए। ये मेरा वादा है माँ! मैं जरूर आऊँगा तेरे पास तुझसे मिलने अपने अंतिम क्षणों में  जब जिन्दगी साथ छोड़ रही होगी एक प्रेमिका की तरह और मृत्यु मेरा वरण कर रही होगी एक दुलहन की तरह।तब मैं आऊँगा माँ ! तुझसे मिलने, तेरे पास, क्योंकि  मुझे माँ गंगा ने बुलाया है ।

(समाप्त )

हिमांशु पाठक


उत्तरापीडिया के अपडेट पाने के लिए फ़ेसबुक पेज से जुड़ें।

Previous articleखलिया टॉप बुग्याल की सैर
Next articleरानीबाग-भीमताल मार्ग पर जाम से मिलेगा छुटकारा
हिमाँशु पाठक मूल रूप से पिथौरागढ़ जिले के गंगोलीहाट के पठक्यूड़ा गाँव से है। पाँच भाई-बहनों में सबसे छोटे व सबके प्यारे ।आपका जन्म अल्मोड़ा में 14 जुलाई को एक प्रतिष्ठित ब्राहमण परिवार में हुआ पिता जी का नाम श्री हेम चन्द्र पाठक एवं माताजी का नाम श्रीमती गोबिन्दी पाठक था । आपकी प्रारम्भिक शिक्षा अल्मोड़ा में हुई, व उच्च शिक्षा हल्द्वानी में हुई। वर्तमान में आप हल्द्वानी में शिक्षण कार्य में संलग्न हैं। आपकी रूचि बचपन से ही शिक्षण के साथ-साथ लेखन, गायन व रंगमंच में भी रही । आपकी प्रमुख रचनाओं में से कु छ निम्न प्रकार रही हैं। प्रकाशित पद्य रचनाऐं :- ढलता हुआ सूरज, वो गरीब की बेटी, एक ही स्थल पर, युग आयेगें, दो छोर,गांधारी ,चाय की चुस्की ,जिन्दगी, सप्त-शर्त ,चिट्ठी, बाबूजी, पथिक,वेदना,बैचैनी,चाय पर चर्चा,कोई रोता है, एक पुरोधा का अंत ,काश,कृष्ण से द्वारिकाधीश तक,प्रतीक्षा, अप्रकाशित पद्य रचनाऐं- , , तेरी अदा, दीवारें,,,' आज अगर आजाद भगत सिंह भारत में जिन्दा होते', मौन हूँ मैं, परिवर्तन, दूरी, आदि। प्रकाशित गद्य रचनाऐं : - कुसुम दी, अपने दोहन पर व्यथा-मैं प्रकृति हूँ ,आँखें,जड़ो से दूर,आँगन,सूर्योदय उत्तराखंड का,ढलता हुआ सूरज, इस रात की सुबह,पाती प्रेम की,एक पुरोधा का अंत व एक मोड़ पर,तेरहवीं(धारावाहिक) , एक था बचपन,वो कौन थी,उस मोड़ पर(धारावाहिक),और व्यक्ति का निर्माण या रोबोट का अप्रकाशित गद्य रचनायें :- गंगा के तट पर, छोटी-छोटी बातें,मैं नहीं हम,आत्म परिचय,सफर जिन्दगी का आदि नाट्य रचना : - एक और विभाजन, दोहन प्रकृति का, आत्मदाह, शहीद की हसरत आदि

Leave a Reply