किशोर कुमार जी की पुण्यतिथि पर विशेष

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[dropcap]खं[/dropcap]डवा के कब्रिस्तान में नन्हा ‘ किशोर ‘ छिपा बैठा था। घर के लोग उसे ढूंढ – ढूंढ़कर परेशान थे। आखिर उसके कुछ साथियों ने उसका अड्डा बता दिया। वहां से उन्हें पकड़कर घर लाया गया। जमकर पिटाई हुई , लेकिन यह नन्हा बार – बार कब्रिस्तान की ओर क्यों भागता था? यह कोई न जान पाया। यह नन्हा और कोई नहीं हास्य अदाकारी को नये मानदंड देनेवाले बेजोड़ कलाकार किशोर कुमार थे। 4 अगस्त, 1929 को जन्मे किशोर कुमार 13 अक्तूबर, 1987 को दिवंगत हो गये, और अपने पीछे आवाज की दुनिया , अपनी बेजोड़ अदाकारी और संगीत निर्देशन के क्षेत्र में भी नये करिश्मे दिखाकर, एक ऐसा शून्य दे गये जिसकी पूर्ति सदियों तक नहीं होगी।
पूर्व जन्म में पादरी थे किशोर कुमार?
कहते हैं किशोर कुमार को खेल – कूद , पढ़ाई से भी ज्यादा शांति कब्रिस्तान में जाकर मिलती। जैसे वह मृतात्माओं के साथ ही अपनी जिंदगी गुजारना चाहते हों। इसी संदर्भ में उनका एक पुराना संस्मरण सचमुच अद्वितीय है। कहते हैं कि किशोर कुमार ने सपने में देखा नाम था कि वह गोवा के चर्च में फादर हैं, और धार्मिक उत्सवों में उन्हें प्रवचन हेतु बुलाया जाता है, वहां लोग उन्हें बड़ी श्रद्धा से सुनते हैं। किशोर कुमार को ऐसे सपने कई बार आते थे और उनकी नींद खुल जाती थी। इस बात की जांच के लिए वह गोवा में काफी भटके और सचमुच गोवा में बर्सेवा बीच पर एक कब्र पर इबारत पढ़ने को मिली थी। फादर जार्ज ब्राऊन जन्म 13 अक्तूबर, 1887, मृत्यु 4 अगस्त 1929। और यह पढ़कर वह स्तब्ध रह गये। उन्हें लगा उनका जन्म, उसी फादर का ही पुनर्जन्म था। आश्चर्य तो यह भी हुआ कि किशोर कुमार की मृत्यु 13 अक्टूबर 1987 को हुई और उनका बार-बार अकेलेपन को काटने के लिए कब्रिस्तान की ओर बढ़ना… आदि कुछ चौंका देने वाले तथ्य हैं।

बहुमुखी प्रतिभा के धनी किशोर कुमार ने जहां संगीत को श्रेष्ठतम रूप प्रदान किया। स्वयं गायक, गीतकार, संगीतकार, निर्माता – निर्देशक के साथ ही हास्य व मनोरंजक अदाकारी को भी बेजोड रूप दिया। वह सदा कुछ ऐसा करना चाहते थे, जो और किसी ने न किया हो। वह उबाऊ और नीरस वातावरण में भी संगीत की ऐसी तान छेड देते कि सब सुर में आ जाएं। उनके हर कार्य में एक लय – ताल थी। शुष्क और नीरस अलजबा, ज्यामिति आदि विषयों के अनेक जवाब वह गा – गाकर देते। कठिन प्रश्नों के जवाब भी गाकर हल कर देते जैसे उनके हर प्रश्न में संगीत समाहित हो, हर उत्तर में एक लाजवाब शैली हो। सच कहें तो गायक और नायक के रूप में वह मात्र अकेले ही थे, जिन्होंने तीन हजार से भी अधिक गीत गाये और वह रफी और मुकेश के जमाने में ही गायकी के शिखर पर जा पहुंचे थे। “आराधना” का “मेरे सपनों की रानी कब आएगी तू” स्वर उन्हें बुलंदियों तक पहुंचाने की पहली सीढ़ी कहें तो अतिशयोक्ति न होगी। उनका जन्म सामान्य आय वर्ग के बंगाली – गांगुली परिवार में हुआ। उनका वास्तविक नाम था आभास कुमार। उनके बड़े भाई दादामुनी अशोक कुमार, और दूसरे भाई अनूप कुमार ने भी फिल्मों में अपना अन्यतम स्थान बनाया।

पुरुष और महिला दोनों के स्वर में गायन

सच कहें तो वह एकमात्र ऐसे गायक थे , जिन्होंने पुरुष और महिला स्वर में भी खुद ही गाया। अपने स्टेज कार्यक्रमों में भी जनता की तालियों की गड़गड़ाहट का जवाब वह थैंकयू, धन्यवाद, मेहरबानी आदि गा – गाकर ही देते। गंभीर गानों की रेकॉर्डिंग हो या अभिनय का समय साजिंदों , सहगायकों , तकनीशियनों और कर्मचारियों से हंसी – मजाक करना उन्हें हंसा – हंसाकर लोटपोट करके उन्हें कार्य की नयी ऊर्जाशक्ति देना उन्हें बेहद प्रिय था। उन्होंने सत्येन बोस द्वारा निर्देशित ‘ बंदी ‘ फिल्म में पहली बार अशोक कुमार , अनूप कुमार के साथ अभिनय किया। उन्होंने चार विवाह किये, पहली पत्नी रूमा से उनकी एक संतान थी अमित कुमार, जो आज किशोर – शैली का एकमात्र गायक है। मधुबाला और योगिता से उनकी कोई संतान न थी। लीना चंद्रावरकर से उनकी जो संतान हुई उसका नाम उन्होंने सुमित रखा था। उनकी शरारतभरी अदाएं और मासूमियत उन्हें अन्य लोगों से अलग करती थीं। कहते हैं मधुबाला से उन्हें बहुत प्रेम था। मधुबाला जब बेहद बीमार हो गयी, तो किशोर कुमार ने अपना अधिकांश समय उसी की देखभाल में बिताया था। उनकी हार्दिक इच्छा थी कि मधुबाला उनके ढेरों बच्चों की मां बने, और वह उन सबके साथ खंडवा में समय बितायें। जब मधुबाला का देहांत हुआ, तो किशोर कुमार भी जैसे टूट गये थे। वह अपना अधिकांश समय अकेले बिताने लगे। उनकी आवाज में व्यथा की गहराइयां शायद ऐसे ही क्षणों की देन रही हैं। अभिनय में रुचि नहीं थी, मजे की बात यह भी कि किशोर कुमार को अभिनय में रुचि न थी। उनके बड़े भाई अशोक कुमार जब मुंबई में काफी ख्याति पा चुके थे, विभाजन के बाद किशोर भी उनके पास आ तो पहुंचे कि गायक बनकर नाम कमाऊं। अशोक कुमार की भी प्रबल इच्छा थी और तब उन्हें प्रेम धवन द्वारा लिखा गाना “मरने की दुआएं क्यों मांगूं जीने की तमन्ना कौन करे” गाया। आवाज में दर्द था और स्वर ऐसा प्रतीत हुआ जैसे के.एल. सहगल गा रहे हों।

किशोर कुमार को अभिनय के लिए कुछ रोल दिये गये थे। शाहिद लतीफ जो उन दिनों “जिद्दी” फिल्म का निर्माण कर रहे थे, उन्होंने किशोर की अभिनय प्रतिभा को भी परखा और शायद उन्हीं की बदौलत यह शर्मीला , भावुक गायक चित्रपटल पर भी आ पहुंचा। जीवनभर अपनी अभिनय प्रतिभा से हंसाने का उन्होंने बीड़ा उठा लिया। आवाज के तो वह जादूगर थे ही। अब अभिनय के साथ तो सोने में सुहागा हो गया।

स्वरों के उतार – चढ़ाव , आवाजें बदलकर गाने की क्षमता और महिला और पुरुष दोनों के अभिनय तथा आवाजें बदलकर गाने की कला अनूठी थी। यों उन्हें अनेक बार ऐसे – ऐसे झटके भी लगे थे कि उन झटकों से वह आंदोलित भी हुए। यथा आपातकाल के दौरान उनके गानों पर प्रतिबंध लगा दिया गया और जब यह प्रतिबंध हटाया गया था, तो उनका जो गीत बजा वह उनकी मनःस्थिति का दर्पण कहा जा सकता है। “दुखी मन मेरे, सुन मेरा कहना, जहां नहीं चैना, वहां नहीं रहना”, “यह जीवन है …’

उनकी अभिनय प्रतिभा की बोलती तस्वीरे हैं। वे फिल्में जो युग के लिए, युग – युग के लिए हैं। “चाचा जिंदाबाद”, “झुमरू”, “बागी”, “शहजादा”, “दाल में काला”, “बाप रे बाप”, “पड़ोसन”, “शरारत” आदि अनेकानेक फिल्में उनकी अभिनय क्षमता की बोलती तस्वीरें हैं। चलती का नाम गाड़ी की खटारा गाड़ी, तो आज भी उनके गौरीकुंज में मूक उदास – सी खड़ी है। उस पर अतीत की स्मृतियां लिपटी हैं, “इक लड़की भीगी – भागी सी, सोई रातों में जागी – सी….”

अनेक गीतों के स्वर उसमें सिमटे संवादों की गूंज है और सच कहें तो खटारा गाड़ी की आंखों में भी वही शून्य है जो किशोर कुमार की मृत्यु के बाद सर्वत्र व्याप्त हो गया। शायद ही कोई आंख हो जो किशोर कुमार की मृत्यु का समाचार सुनकर न भीगी हो, शायद ही कोई व्यक्ति हो जिसने इस आवाज के जादूगर के मोहजाल में स्वयं को न उलझाया हो। उनके गीत जन – जन की जुबान पर हैं। हर कोई उन्हें गुनगुनाता है और उसी धुन में, लय में खो जाता है।

अशोक कुमार, किशोर कुमार और अनूप कुमार तीनों भाइयों ने हालांकि फिल्म जगत में नाम कमाया पर किशोर कुमार ही ऐसे प्रतिभाशाली थे, जिनमें संगीत और अभिनय दोनों ही अपनी चरम सीमा पर थे। अशोक कुमार, दादामुनि उन्हें अभिनय के क्षेत्र में लाये थे। जब अशोक कुमार की पत्नी की मृत्यु हुई थी और वह अकेले उदास से बैठे थे, तो किशोर कुमार उन्हें सांत्वना देने का कोई ना कोई बहाना ढूंढ रहे थे दोनों भाई एकांत में बैठे तो किशोर कुमार ने स्वर छेड़ दिया; “यह जीवन है, इस जीवन का यही है रंग रूप…” और दोनों की आंखें छलछला आयीं, पर किशोर भर्राये गले से गाते ही रहे।

आकस्मिक निधन होने से पत्रकारों के प्रति किशोर कुमार का रुख कुछ और ही था। वह प्रायः उनसे भी बड़े स्नेह से मिलते, लेकिन उनके प्रश्नों के उत्तर वह तेज – तर्रार दे देते। किसी को वह अपने पर हावी न होने देते। मध्यम आग वर्ग के गांगुली परिवार में जन्मे किशोर कुमार प्रसिद्धि के शिखर पर पहुंचकर सहसा कूच कर गये। फिल्म जगत के इस अनूठे कलाकार का अंतिम समय इतना शीघ्र आ जाएगा, कोई नहीं सोच सकता था। लगता है किसी बड़े नाटककार का लिखा हुआ श्रेष्ठ नाटक अकस्मात हड़बड़ी में समाप्त कर देने की घोषणा हो गयी हो। 12 अक्तूबर, 1987 की शाम को जैसे, 12 अक्तूबर, 1987 की शाम को जैसे किशोर कुमार में एक नयी उमंग थी। आशा भोंसलेजी के साथ उनका मजाक, मस्ती और शरारतपरी छेड़खानी का दौर बरकरार था। तमाम साजिंदों से भी वह खुलकर हंसी – मजाक कर रहे थे। उनके खुशमिजाज अंदाज यों भी हर किसी में एक नयी ऊर्जा, नयी मस्ती भर देते थे, लेकिन कोई नहीं जानता था कि यह मस्तीभरी शाम आज अपने किसी और अंदाज में आयी है, इसके बाद जो सुबह आएगी, उसकी शाम ही नहीं होगी दादामुनि का जन्मदिन तेरह अक्तूबर को दादामुनि का जन्मदिन था उन्हें मुबारकबाद देने उन्हें जाना था। नाश्ता करने के बाद करीब दस बजे उनके सीने में दर्द हुआ। चेहरे पर पसीना देख लीना घबरायी, लेकिन किशोर कुमार थोड़ी देर आराम करने के 1 बाद ही स्वयं को स्वस्थ महसूस करने लगे थे दोपहर को उन्हें फिर बेचैनी – सी हुई और करीब पौने चार बजे हार्ट अटैक हुआ। डॉक्टर जब तक आये, तब तक वह समाप्त हो चुके थे। नन्हा सुमित बार – बार उन्हें झकझोर रहा था – “डैडी – डैडी…” की आवाजें शून्य में बिखर गयीं। न उन्होंने अपने बेटे की मनुहार सुनी, न ही पत्नी की चीख – पुकार, न उन्हें लोगों की दुआएं लौटा सकीं और न ही अपने दादामुनि की अश्रुपूर्ण आंखें। वह आज सबकी ओर से आंखें मूंदकर चिरनिद्रा में सो गये थे। न किसी का मोहपाश बांध सका, न किसी की ममता जकड़ सकी। हिचकियों और सिसकियों के बीचों – बीच वह सबको छोड़ – छाड़कर निश्चिंत हो चुके थे । ऐसा निर्मोही , निष्ठुर किशोर , हमेशा के लिए जा चुका था और जन – जन के कानों में जैसे यही स्वर गूंज रहा था – “जहां नहीं चैना… वहां नहीं रहना…”

उन्होंने नवोदित अभिनेत्रियों से लेकर अनेक सुप्रसिद्ध नायिकाओं के साथ अविस्मरणीय अभिनय किया- जिनमें मीना कुमारी, वैजयंती माला, माला सिन्हा, नूतन, कल्पना, अमिता, सोनिया साहनी, श्यामा, उषा किरण, शशिकला, तनूजा, राजश्री, मुमताज, रागिनी और सर्वाधिक फिल्में कुमकुम के साथ कीं। सायरा बानो के साथ उनकी पड़ोसन अविस्मरणीय है।


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