अमित शाह के जन्मदिन पर विशेष

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अमित शाह का जन्मदिन 22 अक्टूबर 1964 को महाराष्ट्र के मुंबई में एक व्यापारी के घर हुआ था। इनका पूरा नाम – अमित अनिलचन्द्र शाह है। एक व्यवसायी परिवार से आने वाले अमित शाह राजनीति में इस ऊंचाई तक कैसे पहुंचे! पढ़िये उनका राजनीतिक सफर
भारतीय जनता पार्टी के नेता और भारत के वर्तमान गृह मंत्री अमित शाह राजनीति में कुशल रणनीतिकार समझे जाते हैं। नरेंद्र मोदी के साथ मिलकर 2014 में भाजपा को पहले केंद्र, फिर धीरे-धीरे अधिकतर राज्यों में सत्ता में लाने में उनका अहम योगदान रहा है। 2019 में जब बीजेपी अपने दम पर पूर्ण बहुमत पाकर केंद्र की सत्ता में लौटी, तो पार्टी ने अमित शाह को पार्टी की जिम्मेदारियों से मुक्त कर सरकार में शामिल कर लिया। बतौर गृह मंत्री शाह देश का सबसे मुश्किल और अहम मंत्रालय संभालते हैं।
13 वर्ष की उम्र में गली-लगी लगाते थे पोस्टर
अमित शाह की शुरुआती शिक्षा-दीक्षा मेहसाणा में हुई। शाह की जिंदगी पर उनके दादा की छाप साफ दिखती है। एक बार अपना बचपन याद करते हुए शाह ने कहा था कि उनके दादा नरम रहते थे लेकिन सुबह चार बजे उठना अनिवार्य होता था। भारतीय परिधान में उतनी सुबह तैयार होकर उनको बैठना होता था। उसी समय भारतीय संस्कृति की जड़ें उनके मन में मजबूत हुईं। अमित शाह के परदादा और दादा मानसा स्टेट के नगरसेठ थे। बचपन में उनकी शिक्षा पारंपरिक रूप में आचार्य और शास्त्री से हुई। अमित शाह की उम्र मात्र 13 साल थी जब वह सरदार पटेल की बेटी के पक्ष में दीवारों पर पोस्टर भी लगाते थे जो इंदिरा गांधी के खिलाफ थी। उस वर्ष इंदिरा विरोधी लहर में, गुजरात की 20 लोकसभा सीटों में 15 सीटें जनता पार्टी ने जीती थीं।
पोलिंग एजेंट के रूप में बीजेपी का पहला काम
शाह ने 1980 में मात्र 16 साल की उम्र में संघ की सदस्यता ली थी। उसी साल बतौर पार्टी बीजेपी का जन्म हुआ था। 1984 आम चुनाव में मिली ऐतिहासिक हार के बाद बीजेपी में विचारधारा से जुड़े लोग ही आ रहे थे। 1985 में अमित शाह औपचारिक रूप से बीजेपी में शामिल हुए। एक आम कार्यकर्ता के रूप में पार्टी में शामिल होने वाले अमित शाह को पार्टी का पहला काम मिला था अहमदाबाद नारनपुरा वॉर्ड चुनाव में बतौर पोलिंग एजेंट। उसके कुछ दिन बाद वह वॉर्ड के सचिव बन गए। यहीं से उनके राजनीतिक सफर की शुरुआत हो गई।
नरेंद्र मोदी से कैसे हुआ संपर्क?
1987 में अमित शाह बीजेपी की युवा इकाई के मेंबर बने। शुरुआत में दीनदयाल रिसर्च इंस्टीट्यूट में कोषाध्यक्ष के रूप में उन्होंने उस संस्थान को आगे बढ़ाने में बहुत योगदान किया। आठ सालों के दौरान काम करते हुए अमित शाह ने वहां विचारधारा से जुड़ी कई जानकारी हासिल की और शोध भी पढ़े। वे आज की राजनीति में उनके बहुत काम आते हैं। उसी दौरान वे नानाजी देशमुख के भी संपर्क में आए। वह हमेशा नानाजी को एक दूरदर्शी नेता मानते थे। नानाजी से उन्हें कई सीख भी मिली। दिलचस्प बात है कि उसी समय वह नरेंद्र मोदी के भी संपर्क में आए लेकिन घर में राजनीतिक माहौल उन्हें बचपन से ही मिल गया था। उनके दादा और पिता गांधीवादी थे। 1977 में आपातकाल में जब इंदिरा गांधी की नीतियों के खिलाफ आचार्य जे बी कृपलानी, मणिबेन पटेल सहित कई जनता पार्टी के सपोर्ट में आए तब आचार्य कृपलानी उनके घर में सात दिनों के लिए रुके थे।
बड़े नेताओं के लिए चाय-पानी का इंतजाम करते थे शाह
एक विशिष्ट वैचारिक आंदोलन से पनपे बीजेपी जैसे राजनीतिक दल के प्रत्येक प्रदेश एवं जिला कार्यालय में पुस्तकालय होना चाहिए, यह विचार शाह ने अपने राजनीतिक जीवन के आरंभ में ही दिया था। उन्होंने बताया कि आरंभिक दिनों में जब वह गुजरात में पार्टी के सामान्य कार्यकर्ता थे तो पार्टी की बैठकों और कार्यक्रमों के लिए पानी तथा चाय की पर्याप्त आपूर्ति सुनिश्चित करना ही उनकी जिम्मेदारी थी। उसी समय उन्होंने प्रदेश बीजेपी के एक वरिष्ठ नेता को पत्र लिखकर कहा था कि राजनीतिक पार्टी के कार्यालय में पुस्तकालय अवश्य होना चाहिए, जहां कार्यकर्ता अध्ययन, चिंतन, मनन करने, रणनीति बनाने और स्वयं को वैचारिक एवं बौद्धिक धार देने के लिए एकत्र हो सकें।
बीजेपी के हर बड़े ऑफिस में खुलवाई लाइब्रेरी
एक बार अनौपचारिक वार्तालाप में शाह ने उस घटना को याद करते हुए बताया, ‘पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष उस समय मुझे नाम से नहीं जानते थे। मैं प्रदेश कार्यकारिणी की बैठक स्थल पर था, जहां वरिष्ठ नेता एकत्र थे। सदैव की भांति मैं मेजों की, पानी की, पर्दों और कुर्सियों की व्यवस्था करने में व्यस्त था, जब एकाएक अध्यक्ष महोदय ने कहा कि उन्हें एक युवा कार्यकर्ता का पत्र मिला है, जिसमें प्रदेश तथा जिला कार्यालयों में पुस्तकालय स्थापित करने का आग्रह किया गया है।’ इस बैठक में शाह के पत्र पर चर्चा हुई थी। यह बाद में हर मुख्यालय के लिए जरूरी चीज हो गई।
गुजरात में शाह ने दिखाया अपने दिमाग का कमाल
1991 में जब बीजेपी के कद्दावर नेता लालकृष्ण आडवाणी ने गांधीनगर सीट से नामांकन किया तो अमित शाह उनके चुनाव प्रचार प्रभारी थे। वहीं से उनकी पहचान बननी शुरू हुई। उस समय गुजरात में कांग्रेस का दबदबा था। ग्रामीण इलाकों में बीजेपी की पैठ बेहद कमजोर थी। मोदी और शाह ने मिलकर कांग्रेस का प्रभुत्व समाप्त करने के लिए उन नेताओं का नेटवर्क तैयार किया जो प्रधान पद का चुनाव हारे थे। कोऑपरेटिव्स में भी कांग्रेस को खत्म करने के लिए भी मोदी-शाह ने यही तरीका अपनाया। इससे गुजरात की अर्थव्यवस्था भी बदलनी शुरू हुई। 1999 में शाह देश के सबसे बड़े कोऑपरेटिव बैंक, अहमदाबाद डिस्ट्रिक्ट कोऑपरेटिव बैंक के अध्यक्ष बने। बैंक की हालत खस्ता थी। शाह ने सालभर के भीतर बैंक का कायाकल्प कर दिया और उसे 27 करोड़ के मुनाफे में ला दिया। 2014 आते-आते बैंक का मुनाफा करीब 250 करोड़ हो गया।
मोदी-शाह की जोड़ी ने बीजेपी को बुलंदियों तक पहुंचाया
1997 में मोदी ने शाह को विधानसभा का चुनाव लड़ाने की पैरवी की। वह उसी साल उपचुनाव जीत विधायक बने। 2001 में मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री बने। फिर 2002 में शाह ने अहमदाबाद की सरखेज सीट से डेढ़ लाख से भी अधिक मतों के अंतर से रेकॉर्ड जीत हासिल की। 2007 में यह दायरा और बढ़ गया। मोदी 12 साल गुजरात के सीएम रहे, इस दौरान शाह उनका दाहिना हाथ बने रहे। एक वक्त तो शाह के पास गुजरात सरकार में 12 मंत्रालय हुआ करते थे। 2013-14 में बीजेपी ने नरेंद्र मोदी को केंद्र की राजनीति में लाने का फैसला किया तो शाह के भी दिल्ली आने की चर्चा तेज हो गई। शाह भाजपा के अध्यक्ष बन गए। राजनाथ सिंह के बाद पार्टी की कमान संभालने वाले शाह ने रणनीतिक स्तर पर कई बदलाव किया जिनका फायदा बीजेपी को चुनावों में लगातार मिलता रहा है। आज बीजेपी दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी होने का दावा करती है।
सिर्फ खादी क्यों पहनते हैं अमित शाह?
अमित शाह का परिवार कभी श्री अरविंदो का भी मेजबान बना था। श्री अरविंदो का प्रभाव उनके पूर्वजों पर बहुत पड़ा। उनकी दी गई सलाह को परिवार ने गांठ बांध ली थी कि राजा का फैसला आमजन के लिए होना चाहिए, किसी खास के लिए नहीं। श्री अरविंदो अमित शाह के घर में जिस कुर्सी पर बैठे थे, वह आज भी सुरक्षित ढंग से रखी हुई है। बाद में माता कुसुम बेन का भी उन पर बहुत प्रभाव पड़ा। सबसे पहले वही थी जिन्होंने अमित शाह को सिर्फ खादी पहनने के लिए प्रेरित किया।

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