आपदा में है कई अवसर रोजगार के, उत्तराखण्ड वासियों के लिए

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Uttarakhand Village

कोरोना काल क्या आया ? अपने साथ कुछ संशय लाया, कुछ संभावनायें भी लाया। लाँकडाऊन हुआ, लोगों  को अपना घर याद आया।

ये लोग वही थे, जो पहले कहते थें उत्तराखण्ड में क्या है?

जब मैं कहता था यारो  यहीं रहो, अपना घर अपना ही होता है। अपनी जगह अपनी ही होती है। वैसे भी कहते हैं घर की आधी भली।

तो ये लोग कहते थे, तुम ही रहो यहाँ, वैसे भी कुछ नही है यहाँ पर। हम तो चले परदेश ,वहाँ  सुनहरा भविष्य है, रोजगार के नये-नये अवसर हैं, बच्चों के लिये अच्छी शिक्षा है, व अच्छी चिकित्सा व्यवस्था  है।

मैंने भी हँसकर उनको विदा किया और वो विदा होकर जाते  हुए मुझे ऐसे देख रहे थे मानों  मैं बहुत बड़ा मूर्ख  हूँ।

अब ये लोग लौट कर आने लगे  घर वापस, मानो “लौट के बुद्धु घर को आऐ।”  तो मैंने  भी लगे हाथों पूछ लिया “यारों कैसे याद आ गई घर की, अपनों की, कब तक हो?” वो लोग भी शर्मिन्दा थे। बोले “यार क्या करते वहाँ”? “लाँकडाऊन ने तो जैसे सब कुछ छीन लिया”। तो आज मैं उन्हें बिल्कुल भी छोड़ने के मूड में नही था। मैंने फिर पूछा “क्यों वहाँ तो सुनहरा भविष्य था?” फिर क्या हुआ कि तुम लोग इतना भी जमा नही कर पाये कि इक्कीस दिन भी शहर में नही टिक पाए। “उनकी आँखों में शर्मिंदगी थी।

मैंने उन लोगों को एक जगह पर एकत्रित किया, मुझे खुशी थी कि मेरी बात मान कर वो मेरे बुलाने पर आए।

फिर मैंने उनसे बात करनी शुरू की। “देखो यारों मैं पहले भी तुम्हें यही रहने को कहता था। तब तुम लोग कहते थे यार शहर में रोजगार है, भविष्य है, शिक्षा है व  चिकित्सा सुविधा है। मित्रों मैं भी ये मानता हूँ कि उत्तराखंड में हम लोगों को मिलकर  बहुत कुछ करना हैं।उत्तराखण्ड में, विकास का सूरज उगे, इसके लिऐ हम लोगों को मिलकर प्रयास करना होगा। इसके लिऐ हम लोगों को निम्न बिंदुओं पर काम करना होगा

  1. उत्तराखंड की नैसर्गिक सुन्दरता को बनाये रखने के लिऐ ज्यादा से ज्यादा वृक्ष लगाऐं। जिससे उत्तराखंड में ज्यादा से ज्यादा पर्यटन का विकास हो और स्थानीय लोगों के लिऐ अपने ही घर में रोजगार के अवसरों का सृजन हो सके।
  2. लोग उत्तराखंड में पाँच सितारा होटल में रहने नही आते एसी में बैठकर चाय काँफी पीने नही आते हैं। ये सुविधा  तो उन लोगों को शहरों या महानगरों  में भी  मिल जाती है।लोग यहाँ आते हैं मन की शान्ति के लिऐ,आध्यात्मिक शान्ति के लिये,प्राकृतिक सौन्दर्य का आन्नद लेने के लिये।उन्हें वो सब कुछ यहाँ उपलब्ध कराया जा सकता है। नऐ-स्थानों की खोज कर उन्हें पर्यटन स्थल के रूप मेः विकसित किया जाय ।पर्यटकों के लिऐ स्थानीय लोगों के सहयोग से उनके घरों का उपयोग पर्यटक घरों के रूप में किया जाये ,उन घरों में आवश्यक सुविधायें हों स्थानीय भोजन  पर्यटकों को उपलब्ध कराया जाय, व उन्हें आसपास की जगह घुमाने की व्यवस्था हो तो हर घर में रोजगार के नए  अवसरों का सृजन हो सकेगा।
  3. यारों यहाँ पर अति लघु व लघु  उद्योगों को बढ़ाने पर ध्यान दिया जाय, जैसे मुगोड़ी व बड़ी उद्योग, मडूवे का उत्पादन में वृद्धि कर मडूवे के आटे से बिस्कुट, नमकीन आदि बनाने के लिय उद्योग, मिनरल वाटर प्लांट, फ्रूट जूस  प्लांट आदि। इससे हर घर में रोजगार के नये अवसर उत्पन्न  होंगें।
  4. उत्तराखंड में फल -फूलों के ज्यादा से ज्यादा वृक्ष लगें व औषधि से सम्बन्धित प्लांटेशन पर ज्यादा से ज्यादा ध्यान दिया जाय।
  5. उत्तराखंडमें कुछ प्रजातियाँ विलुप्त होने की कगार में हैं जैसे हिशालू, किलमोड़ि आदि इन्हें फिर से विकसित कर इन्हें पर्यटकों से परिचित कराया जाना चाहिये इसके दो फायदे होंगे एक तो पर्यटकों को नये फलों का स्वाद लेने का आनंद मिलेगा और दूसरा खेतो की फसलों को जंगली जानवरों से सुरक्षा मिल पायेगी।और लोगों की आय बढ़ेगी सो  अलग।  इसके अलावा इनकी जड़ों का उपयोग औषधि के रूप मे भी होता है।

उत्तराखंड में शुद्ध प्राकृतिक जल स्रोतों का विलुप्त होना भी चिन्ता का विषय है मित्रों हमें इस दिशा में भी काम करना होगा। दोस्तो उत्तराखंड में अगर शुद्ध प्राकृतिक जलों की पूर्ति बढ़ानी है तो हमें यहाँ के पर्वतीय स्थलों में ज्यादा से ज्यादा बाँज के  पेड़ लगाने चाहिये बाँज के पेड़ वर्षा के जल को अपनी जड़ों में संचय कर वर्ष भर पानी की आपूर्ति, स्रोतों के रूप में बनायें रखते हैं। स्रोतों का ये जल जमीन के अंदर से होते हुए पहाड़ों से कंदराओं से होते हुए स्रोतों व झरनों के रूप में हमें प्राप्त होता है।

जमीन के अंदर से ये जल विभिन्न औषधिय पौधों को या उनकी जड़ों को स्पर्श करता हुआ बाहर आता है इसलिऐ ये शुद्ध व मीठा तो होता ही है साथ ही साथ स्वास्थ्य के लिऐ भी उत्तम होता है। बाँज के पेड़ तीन की प्रजाति होती हैं और तीनों प्रकार के बाँज की प्रजातियों  की अपनी-अपनी विशेषतायें होती हैं। जैसे मणिपूरी बाँज इसकी  लकड़ियों का उपयोग भवन निर्माण में होता है पर ये कमजोर होती हैं। सामान्य बाँज का उपयोग भी जल संचय के साथ ही ईमारती लकड़ी के रूप में भी उपयोगी होता है, तीसरा लट्टू बाँज ये बहुत ही लाभकारी प्रजाति है ये ना केवल अत्यधिक मात्रा में जल संचय करने के साथ उस क्षेत्र को ठंडा रखता है बल्कि इसकी लकड़ी काफी मजबूत होन के कारण भवन निर्माण में अत्यधिक उपयोगी होती है।

अच्छा प्राकृतिक जल स्रोत होंगे तो इसके भी दो फायदे होंगे एक तो शुद्ध प्राकृतिक जल ना केवल हमें मिलेगा बल्कि हम इन्हें बाहर भेजकर अपनी आय के नऐ स्रोत पैदा कर सकते हैं। दूसरा हम झरनों व स्रोतों पर छोटे-छोटे थर्मल पावर प्लांट लगाकर अपने लिये विद्युत उत्पन्न कर सकते हैं और अपने उद्योगों को भी सुचारू कर सकते हैं। इस तरह हम सरकार पर बिजली की निर्भरता को हम कम भी कर सकते हैं।

तो क्या कहते हो दोस्तों, पसंद आई  मेरी योजना जिस पर काम कर हम अपने ही घर में रहकर ना केवल आत्मनिर्भर बन सकते हैं,बल्कि उत्तराखण्ड का भी भाग्योदय कर सकते है।

“परन्तु ये सब होगा कैसे”? उन्होंने पूछा

मैने कहा “बहुत ही सरलता से”। त्रिस्तरीय कार्यक्रम के द्वारा हम इस योजना को सफल बनायेगें।

“वो कैसे”? उन्होंने फिर पूछा

मैंने कहा “देखो”।

पहले हम लघुस्तरीय  योजना बनाकर यहाँ लघु उद्योगों को बढ़ावा देंगे जैसे पर्यटक आवास योजना का  क्रियान्वयन ।

दूसरा हम मध्यम स्तरीय योजना पर काम करेंगे जैसे उत्तराखंड में नये-नये पर्यटन स्थलों को तलाश कर उसकी जानकारी सोशलमिडिया,  मिडिया व अन्य माध्यमों से लोगों तक पहूँचायगें।

तोसरा हम दीर्घ स्तरीय योजना पर काम करते हुऐ।, हम वृक्षारोपण पर ज्यादा ध्यान देते हुऐ फल-फूल के पेड़ जैसे आड़ू, खुमानी, प्लम काफल, सेब व आम जैसे फलों का पेड़ लगाकर फल उद्योग को बढ़ावा देंगे। वहीं दूसरी ओर हम फूलों पलाश, बुरूश, मंदार, गूलाब व हजारी आदि लगा कर उत्तराखंड की खूबसूरती में चार चाँद लगाएंगे। इसके साथ हम बाँज के पेड़ लगाकर वर्षा के जल का संचय कर प्राकृतिक जलों के स्रोतो को बढ़िने पर ध्यान देंगे व देवदार व चिनार के पेड़ों की लगा कर प्राकृतिक सौन्दर्य बढ़ाते हुऐ उत्तराखंड का महत्त्व बढ़ायगे। इसके अलावा हिसालु, किलमोड़ी को भी बढ़ावा देकर औषधीय उद्योगों पर भी ध्यान देंगे”।

“इसके लिऐ धन कहाँ से आयेगा”? उन्होंने फिर पूछा।

मैने कहा देखो हम कोओपरेटिव सोसायटी बना कर एक -दूसरे की सहायता करेंगे। सैल्फ हैल्प ग्रुप बनाकर एक-दूसरे को सहयोग करते हुऐ हम आगे बढ़ेंगे, इसके साथ ही हम महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा देकर उनको भी अपने साथ जोड़गे। हम शिक्षा व चिकित्सा के क्षेत्र में भी काम कर यहाँ हर वो सुविधायें लायगें जिससे हमें फिर अपना घर छोड़कर पलायन ना करना पड़े।

मेरे दोस्तों ने ना केवल मेरी बात को तन्मयता से सुना बल्कि उन्होंने निश्चय किया कि हम अब वापस शहर नही जायगें बल्कि यहीं रह कर ना केवल अपना बल्कि अपनों के साथ अपने घर का भी विकास करेगें।

आज घर खुश था घर के बुजुर्ग खुश थे, और खुश था उत्तराखण्ड क्योंकि आज हुआ था सूर्योदय उत्तरा खण्ड का


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हिमाँशु पाठक मूल रूप से पिथौरागढ़ जिले के गंगोलीहाट के पठक्यूड़ा गाँव से है। पाँच भाई-बहनों में सबसे छोटे व सबके प्यारे ।आपका जन्म अल्मोड़ा में 14 जुलाई को एक प्रतिष्ठित ब्राहमण परिवार में हुआ पिता जी का नाम श्री हेम चन्द्र पाठक एवं माताजी का नाम श्रीमती गोबिन्दी पाठक था । आपकी प्रारम्भिक शिक्षा अल्मोड़ा में हुई, व उच्च शिक्षा हल्द्वानी में हुई। वर्तमान में आप हल्द्वानी में शिक्षण कार्य में संलग्न हैं। आपकी रूचि बचपन से ही शिक्षण के साथ-साथ लेखन, गायन व रंगमंच में भी रही । आपकी प्रमुख रचनाओं में से कु छ निम्न प्रकार रही हैं। प्रकाशित पद्य रचनाऐं :- ढलता हुआ सूरज, वो गरीब की बेटी, एक ही स्थल पर, युग आयेगें, दो छोर,गांधारी ,चाय की चुस्की ,जिन्दगी, सप्त-शर्त ,चिट्ठी, बाबूजी, पथिक,वेदना,बैचैनी,चाय पर चर्चा,कोई रोता है, एक पुरोधा का अंत ,काश,कृष्ण से द्वारिकाधीश तक,प्रतीक्षा, अप्रकाशित पद्य रचनाऐं- , , तेरी अदा, दीवारें,,,' आज अगर आजाद भगत सिंह भारत में जिन्दा होते', मौन हूँ मैं, परिवर्तन, दूरी, आदि। प्रकाशित गद्य रचनाऐं : - कुसुम दी, अपने दोहन पर व्यथा-मैं प्रकृति हूँ ,आँखें,जड़ो से दूर,आँगन,सूर्योदय उत्तराखंड का,ढलता हुआ सूरज, इस रात की सुबह,पाती प्रेम की,एक पुरोधा का अंत व एक मोड़ पर,तेरहवीं(धारावाहिक) , एक था बचपन,वो कौन थी,उस मोड़ पर(धारावाहिक),और व्यक्ति का निर्माण या रोबोट का अप्रकाशित गद्य रचनायें :- गंगा के तट पर, छोटी-छोटी बातें,मैं नहीं हम,आत्म परिचय,सफर जिन्दगी का आदि नाट्य रचना : - एक और विभाजन, दोहन प्रकृति का, आत्मदाह, शहीद की हसरत आदि

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