मजबूत बनें, सकारात्मक कैसे सोचे

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नर हो न निराश करो मन को‘” यह पंक्तियां भले ही बचपन में पढ़ाई के दौरान हमें समझ में न आती हो, परंतु वर्तमान समय में भागदौड़ भरी जिंदगी और मशीनी जीवन में जिस तरह युवा वर्ग अवसाद से ग्रसित होते जा रहे हैं, ऐसे में ‘कवि मैथिलीशरण गुप्त जी’ द्वारा रचित कविता ‘नर हो ना निराश करो मन को’ जीवन की वास्तविकता, जीवन के सही मायने को बयान करती नजर आती है

उस समय के स्कूली दिनों में हमारा उद्देश्य परीक्षा के लिए कविता याद करना, या इससे संबंधित प्रश्नों का उत्तर देना या संदर्भ सहित व्याख्या करना होता था। प्रस्तुत कविता में कवि क्या कह रहे हैं! क्या कहने का प्रयास कर रहे हैं! यह बात हम समझ ही नहीं पाए, परंतु जैसे-जैसे जीवनशैली में परिवर्तन आया, मानसिक विकास हुआ, तब कहीं शायद इन पंक्तियों का महत्व समझ आया। आज देश जिस गंभीर बीमारी से जूझ रहा है जिसके कारण कई लोग बेरोजगार हो गए हैं, और कई लोग बीमारी की वजह से या भूख-प्यास से जूझते हुए अपनी जान गवाँ बैठे हैं, ऐसी स्थिति में किसी का भी निराश हो जाना स्वाभाविक है।

परंतु विचार करें, सिर्फ रोने से या हाथ पर हाथ रखकर बैठने से कुछ प्राप्त नहीं होगा। मानव जीवन ईश्वर द्वारा दिया गया एक अनमोल उपहार है। प्रत्येक मनुष्य के पास मात्र एक ही जीवन है। अब यह हम पर निर्भर करता है कि, मदद के लिए दूसरे की प्रतीक्षा करें, चमत्कार होने का इंतजार करें या स्वयं को मजबूत बनाकर जीवन में परिश्रम करके जिंदगी को पुन: आबाद करने का प्रयत्न करें।

स्वयं का अवलोकन करें :  प्रत्येक मनुष्य में कोई ना कोई विशेषता अवश्य होती है। आधुनिक जीवन शैली का कुप्रभाव, हमारे जीवन में इस कदर बढ़ गया है कि मशीनी युग में हम भी मशीन बन चुके हैं। आवश्यकता है स्वयं का अवलोकन करने की। यह तय है कि कोई भी अपने आप में संपूर्ण नहीं होता, लेकिन हम स्वयं का अवलोकन करेंगे तो पाएंगे कि हम किन चीजों में निपुण हैं? हमने क्या गलती की? और क्या कमी रह गई है हमारे कार्य में!

हार ना माने :  हो सकता है कि हम कोई कार्य करें और पहली ही बार में सफल ना हो पाए। बजाय इसके कि आप प्रयास करना छोड़ दें, और हार मान लें, आपको कोशिश करनी चाहिए। इस संसार में कुछ भी असंभव नहीं है। कोई भी कार्य तब तक संभव नहीं है जब तक आप यह मन से नहीं मान लें कि वास्तव में यह नहीं होगा।

आज का काम कल पर ना टालें : अक्सर देखा गया है, कोई भी काम तब नहीं होता, जब हम उस काम को आज की बजाय कल पर टाल देते हैं, जैसे- मेरे घर की बिजली के बिल को जमा करने तारीख 25 है और 1 तारीख को ही मुझे बिल प्राप्त हो गया लेकिन मैंने सोचा अभी तो 25 दिन है कल कर लेंगे, कल सोचा एक-दो दिन बाद कर लेंगे। ऐसा करते-करते अंतिम तिथि

मैथिलीशरण गुप्त

कब चली गई याद नहीं रहा, और क्या हुआ? हुआ यह कि मेरे घर की बिजली का कनेक्शन कट गया। यदि मैंने पहले ही बिल जमा कर दिया होता तो शायद आज मेरे घर का कनेक्शन नहीं कटता।

 

काश को ना दे मौका : जब हम जिंदगी में सही समय का प्रयोग नहीं करते, तो बीता समय का काश का रूप ले लेता है, कि काश मैंने उस समयपढ़ाई कर ली होती, काश उस समय अगर थोड़ी सी मेहनत कर ली होती। “संभलो कि सुयोग ना जाए चला कब व्यर्थ हुआ सदुपाए भला” (मैथिलीशरण गुप्त)।

बेहतर होने की उम्मीद करें : यह सत्य है कि समय कभी एक सा नहीं रहता। किसी ने क्या खूब कहा है कि “यह वक्त भी गुजर जायेगा”। अच्छे  वक्त पर अभिमान ना करें, और बुरे वक्त में निराश ना हो। सदैव अपने मस्तिष्क में बेहतर होने की उम्मीद करें। सर्वेक्षण में पाया गया है कि हम जैसा सोचते हैं हमारे जीवन में चीजें हमारी सोच के अनुसार ही घटित होती हैं। उदाहरण – किसी स्वस्थ व्यक्ति को अगर कहा जाए कि वह बीमार लग रहा है, वह कहेगा कि मैं बिल्कुल ठीक हूं। अगर आप यही बात तीन चार दिन लगातार उस व्यक्ति से कहेंगे कि आप बीमार हैं, तो पांचवे दिन वही व्यक्ति डॉक्टर के पास नजर आएगा यह सोच कर कि वह वास्तव में बीमार है।

प्रशंसा करना सीखें : दूसरों की सही प्रशंसा जरूर करें, इससे सामने वाले व्यक्ति का मनोबल बढ़ेगा और आपको संतुष्टि मिलेगी।

मानव जीवन के उद्देश्य को साकार करने का हमें पूरा प्रयास करना चाहिए। परिश्रम तन और मन से करेंगे, तो पाएंगे कि सफलता आपके कदमों में हैं।


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